डॉ. विजयानन्द का महादेवी वर्मा से साक्षात्कार

डॉ. विजयानन्द का महादेवी वर्मा से साक्षात्कार

परिवेश

सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ चुका था। सन्ध्या सुन्दरी अपनी उन्नत सीढ़ियों से धीरे-धीरे धरती पर उतर रही थी। पश्चिम दिशा एकदम लोहित हो चली…। मैं चट-पट हाथ मुँह धोकर एकदम ताजा हुआ। क्योंकि ठीक छः बजे मुझे महीयसी महादेवी जी के आवास पर पहुँचना था। मैंने कपड़े बदले और एक मित्र को साथ लेकर सड़क पर साइकिल का पैडिल दबाकर चल दिया।

न जाने क्यों मन नहीं हो रहा था। फिर भी मन दबाकर पैडिल दबाते हुए अशोक नगर की तरफ बढ़ता जा रहा था। मैं यह अवसर गँवाना नहीं चाहता था। क्योंकि दो बार चक्कर काटने के बाद महादेवी जी से साक्षात्कार लेने की स्वयं अनुमति मिली थी।

कहना चाहिए, मुझे महादेवी जी से यह अनुभव मिला कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से मिलना आसान नहीं है।… जब कलम कागज लेकर, दो बार निवेदन के बाद भी साक्षात्कार उन्होंने नहीं दिया, मुझे हताश होकर लौटना पड़ा, तब बुद्धि ठिकाने आयी। खैर इस बार सोचकर जा रहा था- आज अन्तिम प्रयास है, असफल हुआ तो अब दुबारा नहीं आऊँगा…।

तब तक हमारे साथ चल रहे मित्र ने कुछ और बात छेड़ दी। हम कुछ ही मिनटों में अशोक नगर पहुँच गए ! दरवाजा खोला, और बगल में साइकिलें खड़ी कर उनके बरामदे में गए। कॉल बेल दबाकर चुपचाप काले सोफे पर बैठ गए। थोड़ी ही देर में श्री रामजी पाण्डेय निकले। जब हमने अपने आने का कारण बताया, तो वे पुनः अन्दर गये। बाहर आये तो महादेवी जी की बैठने के लिए संस्तुति उनके मुख से निकली।…

लगभग आधे घन्टे तक चुपचाप हम बैठकर इन्तजार करते रहे। फिर पाण्डेय जी उठे और बिना कुछ कहे अन्दर चले गए, इतने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुछ स्नातकोत्तर के साहित्य में रूचि रखने वाले छात्र आ गए। उन लोगों ने भी दस मिनट इन्तजार किया। उन लोगों से आपसी परिचय भी हुआ। इतने में मैंने पुनः उठकर कॉल बेल दबायी। फिर पाण्डेय जी निकले। उन्होंने नवागन्तुकों से बात की। फिर मैंने अपनी बात कही। वे बोले- भाई! क्यों घबड़ा रहे हैं? जानते ही हैं कि वे अस्वस्थ रहती हैं। फ्रेश होकर साड़ी पहन रही हैं… थोड़ा और समय लगेगा।

मैंने कहा- ठीक है, हम लोग तो धरना देकर बैठे ही हैं। हम लोगों की प्रतिक्षा के लगभग एक घण्टे पूर्ण हुए तो बिना प्रयास के महादेवी जी ने अपने बैठक में आकर हमें बुलवाया…।

हमने अन्दर पर्दा उठाकर प्रवेश किया। श्वेत वसना महादेवी जी विराजमान थी। पतली तख्त दीवार से लगी थी। सिरहाने आलमारियों के ऊपर भारतीय ज्ञानपीठ से प्राप्त वाग्देवी की प्रतिमा शोभायमान थी। उसके बगल में महात्मा बुद्ध की प्रतिमा भी लगी थी। खिड़की के पास लाठी लिए गाँधीजी! और सामने टेलीविजन स्टूल पर शोभायमान था। उसके ऊपर कुछ गुलदस्ते, रेखाचित्र एवं एक-दो पुस्तकें…।

उनके बिस्तर के बगल की खिड़की पर भी कुछ पुस्तकें थी। पैड… कलम एवं कुछ सादे कागज भी दिख रहे थे। हम कुर्सियाँ खींच कर बैठे। विश्वविद्यालय के छात्र पर्याप्त कुर्सियाँ न होने के कारण नीचे बिछी कालीन पर बैठ गये। मैंने प्रणाम किया और अपनी प्रश्नावली आगे बढ़ा दी। उन्होंने उसे पढ़ा, मुस्करायीं और मेरी तरफ बढ़ाकर कहा- प्रश्न तो बहुत कम हैं।

मैंने कहा- यह तो प्रश्नों की रूपरेखा मात्र है। आप बतायेंगी तो प्रश्न खुद नए बनते-बढ़ते जाएँगे…! उन्होंने अपनी मधुर मुस्कान बिखेरी- भई तुम बड़े उस्ताद आदमी हो। पाण्डेय जी इतने में जलपान, व्यवस्था के साथ उपस्थित हुए…। इन सबसे निवृत्त होकर हमने साक्षात्कार शुरू किया… महादेवी जी उत्तर देती गईं। कुल मिलाकर साढ़े नौ बजे रात तक साक्षात्कार चला। उन छात्रों ने भी कुछ अतिरिक्त बात की। उसके बाद हम वापस आये। महीयसी महादेवी जी ने अपने इस वार्तालाप से मन प्रसन्न कर दिया। इससे मुझे ऐसा लगा कि मेरा दो बार का असफल प्रयास अब पूर्णतः सफल हो गया।

साक्षात्कार

प्रश्नः- हिन्दी कविता में छायावाद क्या है? इसको इस नाम से अभिहित क्यों किया गया?

उत्तरः- हिन्दी कविता में छायावाद एक ऐसा कालक्रम था, जब रहस्यवाद के नए आयाम में प्रस्तुति हो रही थी। हमारे युग में बहुत ऐसे कवियों ने लिखा है जो पूर्णतया रहस्यवाद की श्रेणी में आता है। छायावाद रहस्य का ही एक दूसरा प्रारूप है, जिसे लोगों ने स्वीकार किया, और यही उस युग को यह नाम देने का कारण भी है।

प्रश्नः- कुछ आलोचकों ने आपकी कविताओं को भक्तिकाव्य की महान कवियत्री मीराबाई से जोड़ते हुए आपको इस आधुनिक युग की मीरा कहा है। कृपया सुझाएँ कि इस संदर्भ में आपकी राय क्या है?

उत्तरः- भाई! यह तो आलोचकों की कृपा है। वैसे मध्यकालीन युग में सचमुच मीरा ही एक ऐसी कवियत्री थी, जिसमें नारी का अन्तर्विद्रोह झलका है। मैं इसीलिए स्वयं मीरा को बहुत ही श्रद्धा की दृष्टि से देखती हूँ, मेरे काव्य में भी उनकी पूज्य भावना प्रधान है। अपनी स्मृति में उसकी छाया से ही सुख का अनुभव कर लेती हूँ। उनकी स्मृति छाया मुझे सचमुच पवित्र कर देती है। उस विद्रोही नारी की त्याग भावना आज भी मुझे प्रेरणा देती है।

प्रश्नः- साहित्य क्षेत्र में आपने कब और किन रूपों में प्रवेश किया। अपने आरम्भिक जीवन के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का विहंगम दृष्टि से अवलोकन करायें, तो अति कृपा हो।

उत्तरः- आपको यह तो मालूम ही होगा, मेरा जन्म 1907 में फर्रुखाबाद में हुआ। वह निश्चित रूप से साहित्य चर्चा के लिए एक नगण्य स्थान था। अब भी है। परन्तु मेरी माताजी ही इसकी प्रेरणा रहीं। पिताजी की तरफ से मुझे कोई ज्यादा सहयोग नहीं मिला, और नहीं तो सक्सेना परिवार की तत्कालीन मान्यताओं के अनुरूप उन्होंने मेरा विवाह भी कर दिया, जब मैं एक अबोध बालिका थी। जब बड़ी हुई तो मेरा मन शिक्षा की तरफ केन्द्रित हुआ। मैंने इलाहाबाद आकर एम० ए० किया। पति से तो अनबन रही मगर उनका कुछ समय तक आर्थिक सहयोग मिलता रहा। फिर मैं प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्य बनायी गई।

इलाहाबाद में आने पर मेरी साहित्यिकता का अंकुर फूटा था। कई बड़े कवियों के सम्पर्क में आयी। दद्दा (मैथिली शरण गुप्त), निराला, इलाचन्द, गंगा प्रसाद आदि से काफी निकटती रही। फिर उन्हीं लोगों की प्रेरणा से मुझे सृजन का सुयोग मिला। प्रसाद (जयशंकर प्रसाद), पन्त (सुमित्रा नन्दन पन्त), निराला (सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला) के साथ मेरी कविताओं को भी छायावाद से जोड़ा गया, और मुझे देश की जनता ने भी काफी सम्मान दिया।

प्रश्नः- अब तक तो आपने छायावाद की ही बात की… मैं आपको उससे कुछ इतर ले जाना चाहता हूँ। क्या आप यह बता सकती हैं कि छायावाद के बाद हिन्दी कविता का उत्कर्ष हुआ या अपकर्ष…? वैसे यह तो एक विवादास्पद प्रश्न है ही; फिर भी मैं आपके मन्तव्य जानना चाहता हूँ।

उत्तरः- हिन्दी कविता में छायावाद का उद्भव उस समय हुआ, जब सम्पूर्ण भारत में जागरण की लहर काफी तीव्र गति से चल रही थी। हम महज साहित्य का ही अवलोकन करें तो यह काल काफी नवीनता लिए था।… कथा युग जासूसी तिलिस्म के कुहासे से निकलकर सामान्य यथार्थवादी जीवन में उतर रहा था। इस युग से साहित्य की लगभग सभी विधाओं ने नया जन्म एवं विकास पाया। छायावाद के साथ ही राजनीति का भी यह स्वर्ण युग था। राजनीति में बापू (महात्मा गाँधी) के अवतार के साथ अनेको नेताओं ने आलोक फैलाये। वेदों, पुराणों व शास्त्रों में बन्द सत्य, अहिंसा जैसे जीवन मूल्यों ने सामान्य जीवन में अवतरण पाया। वैसे इस काल के सभी क्षेत्रों में आलोक पर्व के उदेत्वन का अवलोकन किया जा सकता था।

इसी युग में मानव जीवन की सौन्दर्यानुभूति का शाश्वत आविर्भाव कविता में हुआ। छायावाद की कविता को हिन्दी कविता का स्वर्णयुग कहा जाय, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह उस युग के उज्वल इतिहास का उज्वलतम् पृष्ठ है।

अब तो साहित्य क्या हर क्षेत्र में ह्रास होता जा रहा है। मैं तत्कालीन कविता को इस ह्रास के गुण से जोड़ना उपयुक्त नहीं समझती। (हँसकर) खैर, यह सब तो तुम जैसे नए अध्ययनशील आलोचकों का काम है। उसकी आप अच्छी तरह मीमांसा कर सकते हो।

भई, कविता कोई कानून के दायरे में बँधकर नहीं चलती। वह केवल मनुष्य की सोच में परिवर्तन ला सकती है। और यह सब उसकी गूढ़ संवेदना से ही उद्भूत हो सकता है। भाव की चरम सीमा से ही कर्म की अनिवार्यता परिलक्षित हो सकती है। आज की कविता में जीवन की कोई प्रेरणा नहीं, वह तो मात्र रोग शैय्या पर लेटे रोगी का विलाप बनकर रह गई है।

प्रश्नः- आपकी सन्ध्यगीत, नीरजा, निहार, रश्मि (काव्य संग्रह) आदि की कविताओं को मैं कई बार पढ़ गया। आपके गीतों में तीव्र आध्यात्म की लौकिकता ही दिखाई पड़ती है। आपका इस सन्दर्भ में क्या कहना है?

उत्तरः- मेरे गीत लौकिक प्रतीकों में अभिव्यक्त होने के बाद भी लक्ष्य के रूप में पूर्णतया अलौकिक हैं। गीतों के सृजन में अनुभूति की ही महत्ता सर्वाधिक होती है। जिसके अन्तर्गत भावना, दर्शन, कल्पना सौन्दर्य आदि कुछ महत्वपूर्ण शब्द शिल्प से ही संग्रहित हो सकते हैं। हिन्दी कविता के मध्य युग की समस्त साधना गीतों में ही अभिव्यंजित है। वेदों में रचे छन्द, गीत ही हैं। मानवीय मूल्यों से उद्भूत चेतना गीतात्मक शब्दों से ही तन्मयता प्राप्त कर सकती है। रहस्यवाद पर आधारित मेरे निबन्ध इस तरफ संकेत करते हैं। इस लिए आप मेरे गद्य साहित्य को पढ़ लो, फिर बात करो तो अच्छा होगा।

प्रश्नः- यह तो सत्य है कि पद्य की अपेक्षा मैनें आपका गद्य साहित्य कम पढ़ा है। क्या आप बता सकेंगी इन दोनों रूपों में आपको अपना कौन सा रूप ज्यादा पसन्द है?

उत्तरः- मैं मूलतः कवयित्री तो हूँ ही, इसमें दो राय नहीं। परन्तु मुझे अपना गद्यकार भी कम प्रिय नहीं है। संस्कृत के आचार्यों ने कहा है- यही कारण है कि मैंने गद्य की भी स्तरीय रचनाओं का सृजन किया है। मेरे रेखाचित्र, संस्मरण आदि इसी भावधारा के महत्वपूर्ण विराम स्थल हैं।

प्रश्नः- अब मैं आपके व्यक्तिगत जीवन के संदर्भ में कुछ जानना चाहता हूँ। मात्र इसलिए कि लोग पारिवारिक जीवन को काफी महत्व देते हैं। लेखक के लिए इसका कितना महत्व है, यह तो मैं नहीं जानता… लोग कहते हैं कि एक स्त्री के लिए सन्तान प्राप्ति आवश्यक है…?

उत्तरः- (मध्य में ही) मैं समझ गई। तुम जो पूछना चाहते हो। मेरी सोच कुछ दूसरे तरह की आरम्भ से ही रही है। प्रकृति से स्त्रियों में वात्सल्य रस पुरुष की अपेछा ज्यादा भरा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में इस तरह के कई उदाहरण हैं। जैसे दुष्यन्त ने शकुन्तला को पुत्र प्रदान कर उसे पहचानने से इकार कर दिया। उसके पालने का सारा दारोमदार शकुन्तला पर ही आया। वहीं, दूसरी ओर मेनका ने विश्वामित्र से पुत्र प्राप्त कर उन्हें ही पालने को सौंप दिया। मैं तो आरम्भ से ही आध्यात्म में रूचि रखती रही। सत्संग में जाती रही, बौद्ध से काफी प्रभावित रही। फलतः आध्यात्म के बूते मैनें इस तरह की तमाम इच्छाओं को दबा दिया।

वैसे आज भी चरित्र का संकट चारों तरफ छाया है। चरित्र सचमुच एक ऐसी जीवन पद्धति है, जिसका अवतरण जीवनमूल्यों में आस्था रखकर अन्तर्गत तथा समाज आदि के सामंजस्य से होता है। यह तो निश्चित ही है कि जीवन मूल्य एक निश्चित कालखण्ड में नहीं बनते, उनके निर्माण में कई पीढ़ियाँ तथा युग बीत जाने हैं। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय आदि एक युग का निर्माण थोड़ी हैं, आज अपनी संवेदना के माध्यम से ही रचनाकार इन सन्दर्भों में चेतना ला सकता है। मैंने इसी तरह के प्रभावों से प्रभावित होकर तमाम रचनाएँ लिखीं, रेखाचित्र बनाये… जिससे संवेदनाएँ नए रूपों में प्रस्तुत हो सकें। जिससे जीवन को भी कुछ सीख मिले।

मेरा मत है कि जब तक आज का कवि जीवन की विरुपता का दयनीय चित्र अंकित करता रहेगा, तब तक उसकी यथास्थिति ऐसी ही बनी रह जायेगी। जब तक रचनाओं में मानव संवेदना तथा चेतना का उद्वेलन नहीं उठेगा, तब तक किसी भी तरह के परिवर्तन की आशा नहीं की जा सकती। इसके लिए नई पीढ़ी को सोच समझकर आगे आना चाहिए…। मैं क्या कर सकती हूँ! मुझसे जो लिखा पढ़ा जा सका, मैंने लिख पढ़ दिया… अब तो कुछ भी लिखना पढ़ना असम्भव है। जब भी कुछ लिखने को सोचती हूँ, अस्वस्थता आड़े आती है!

प्रश्नः- इसका मतलब कि अब आप कुछ लिखना भी नहीं चाहतीं।

उत्तर:- कैसे लिख सकती हूँ। जिन्दगी भर मैं ही लिखती रहूँगी या तुम लोग भी लिखोगे। अब तुम्हीं लोग लिखो। मुझे और मेरी कलम को विराम करने दो, थकी उँगली हैं टूटे तार…!

(आगे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। रात के नौ बज गए थे!)

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