गाँव में चाँद
नीम के ऊपर से
पीपल के पत्ते जैसा
पहाड़ों के पार चमकता है,
बच्चे गेंद जैसी आँखों से
चाँद का गोल होना देखते हैं
और दादी की कहानी में
एक बुढ़िया चाँद पर सूत कातती है

गाँव की औरतों को चाँद के
हज़ारों गीत याद हैं,
जवान लड़के प्रेमिकाओं को
‘चन्दा’ कहते है,
हालाँकि वे कवि नहीं थे
कवियों के पुराने उपमानों को दोहराते
खुले आसमान के नीचे
चाँद को प्रेम की कहानियाँ सुनाते

अब पूर्णतयः ख़ाली बेरोज़गारों की भीड़
नौकरी और काम की तलाश में
शहरों की ओर दौड़ी

वहाँ उनको न काम मिला, न नौकरी
शहर के जीवन से इतने ऊब चुके थे
न कोई उनको आवाज़ देता
न कोई सुनता
न कोई रुकता
न कोई बात करता
न चन्दा थी, न चाँद

वे जीवन और ईश्वर से
इतने तंग आ चुके थे
आत्महत्या के लिए
क़ुतुब मीनार जैसी इमारतों पर चढ़ गए
अचानक दिखता है ‘चन्दा’
और याद आता है
चाँद के नीचे बैठा सारा गाँव…!

वे जीवन के दृश्य को देखकर
फिर-फिर जीने लगते हैं!

अमर दलपुरा की कविता 'ओढ़नी के फूल'

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