ओढ़नी के फूल

साँस में साँस थी उसकी
इसी ऊर्जा से जीवन चलता रहा
वो नींद और रात को मुलायम बनाकर
बेतरतीब सपनों की सिलाई करती रही
मैं उसकी ओढ़नी के फूलों में
इस तरह लिपटा रहा
जैसे अधखिले फूल पर ओस सोयी है

हाथ में हाथ था उसका
इसी विश्वास पर पैर चलते रहे
एक पल तुम जियो
एक पल मैं जीती हूँ
दो पल की ज़िन्दगी को साथ जीते हुए
दिन-रात कटते रहे…

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