1

ढलते चाँद के साथ ढलते हैं जुगनी के तमाम सपने भी
उगता सूरज आँखों मे उगा देता है एक कठोर दिन
चल पड़ती है जुगनी
अपने सपनों को उछलती बकरियों की पीठ पर लादकर

तमाम इल्ज़ामों को बिखरा देती है तिनका-तिनका कर
तिनके बिछ जाते हैं हरी पत्तियाँ बनकर
खोंट लेती है जुगनी इल्ज़ामों की अंकुरायी कोपलें
तब
चरती बकरियों के साथ-साथ पगुराती है जुगनी

अपनी स्वतन्त्रता घोल दी है जुगनी ने
बकरियों के चपल पैरों में
मंझा आती है तमाम झाड़-झँखाड़ों में
उचककर खोंट लाती है कँटीले बबूल की सबसे हरी टहनी
सीख गई है जुगनी, काँटों से हरियाली चुन लेने की कला।

2

रेहड़ से कम होती बकरियाँ देख सहम उठती है जुगनी
मिन्नते करती है प्रकृति माँ से
कि प्रकृति रंग ले बकरियों को पत्तों के रंग में
और उसे दे दे तने का भूरा रंग
पेड़ हो छुप जाना चाहती है जुगनी प्रकृति माँ के आँचल में

जानती है जुगनी,
हाट बिकाती बकरियों की तरह ही बिक जाती हैं लड़कियाँ
बकरियाँ लटकती हैं खाल काढ़ी जाने के बाद
लड़कियों की खाल ही लटक जाती है बिकते-बिकते
कि बकरियाँ मर जाती हैं कुछ उदरों को तृप्तकर
लड़कियाँ मारी जाती रहेंगी तृप्त उदरों की तृप्ति के लिए।

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