मुँह अँधेरे चल पड़े हो
कहाँ अगला ठौर, राही?
कहाँ अगला मील का पत्थऱ
जो कह दे श्वास भर लो
कहाँ अगली मोड़ जिससे 
पाँव पगडंडी पकड़ लें
और कितनी दूर है अब
ठौर लायक गाँव, राही?

पूछना राही से सारे प्रश्न
निष्फल जा रहा है
वो स्वयं ही एक धर
दूजे कदम को पा रहा है
धीर में है मान पथ का
खो गया है किन्तु राही
विवशता में बड़बड़ाता
“कब है अगली नाव, राही?”

और कितनी दूर है अब
ठौर लायक गाँव, राही?

Previous articleमैं इंसान-ए-नौअ हूँ
Next articleबात