“अरे देखो रे रिंकिया… दिन दहाड़े वो बुढ़िया खुखड़ी चुरा कर भाग रही है, पकड़ो पकड़ो उसे… खुखड़ी छीन कर वापस रख लेना।” रिंकिया की माई ने चिल्लाते हुए कहा।

रिंकिया तुरन्त बिजली की गति खेत में भागी। ढ़ेला से पैर में ठेस भी लगी लेकिन पैर झाड़ते हुए वह बुढ़िया के पास पहुँच गयी और उससे गठरी छीन कर खुखड़ी खुखड़ी के गल्ला में गिरा दी। रिंकिया की माई ने दूर से ही यह देख कर राहत की साँस ली और अपनी सास मलिकाइन यानी रिंकिया की ईया (दादी) की ओर मुड़ी, “हयी बुढ़ा को रखवारी के लिए बैठाया था तो चली आयीं? वो खुखड़ी चुरा ले जायेगी तो लवना का इन्तजाम कहाँ से होगा। अपने तो कुछ करना-धरना है नहीं।”

“रघुआ बता रहा था कि हमारा वोट का कारड नहीं मिल रहा, ये ही से चले आये ढूँढने।” बड़ी ही शांति से मलिकाइन ने जवाब दिया।

इतने में रघुआ ने पूछा, “ईया यहाँ पूरे घर भर का कार्ड है। फोटो बहुत धुंधराया है, समझ में नहीं आ रहा कि कौन किसका कार्ड है। नाम क्या है आपका… बताओ तो पढ़कर ढूँढ दें।”

मलिकाइन सोच में पड़ गयी। बचपन में जेवना कह कर बुलाते थे माई-दादा (माँ-बाप)। कहते थे कि हम डीह बाबा के पूजा के फल हैं। माई डीह बाबा को जेवनार चढ़ा रही थी, उसी समय उसको दरद उठा और हमारा जनम हो गया। दादा (पिता जी) कहते थे, “जेवनार की तरह मीठ-मीठ सोधीं-सोंधी बात-व्यवहार है हमरे जेवना का, डीह बाबा की तरह सहनशक्ति भी खूब है। कुछ भी हो जाये शीत-बसन्त मुँह नाहीं खोलती।”

माई कहा करती थी, “ये ही गुण से अपने ससुराल में खप जायेगी हमारी जेवना।”

उन लोगों को मेरे सर्वगुण सम्पन्न होने पर इतना गुमान (घमण्ड) था कि पचास बेकति (व्यक्तियों) वाले बड़े परिवार में दुआहे (विधुर) लइका से बियाह कर दिए।

रिंकिया के बाबा (दादा जी) छः भाइयों में से सबसे बड़े थे और दबंग भी। घर के मलिकार वही माने जाते थे, इसलिए लोग उन्हें मलिकार कहकर पुकारने लगे। घर का कोई भी बेटा कमाये, तनखाह (तनख्वाह) उन्हीं के हाथ पर रखता था। फिर वो सबके पैसे से घर चलाते और जमीन खरीदते। घर की तरक्की खूब हुई लेकिन उनकी किस्मत में दुआह होना लिखा था। बचपन का बियाह जवानी में रास न आया तो पहली मेहरारू को छोड़ दिए। दूसरा बियाह बड़ा धूम-धाम से हुआ लेकिन पता नाहीं का हुआ कि वो माहूर (जहर) खा कर परान (प्राण) त्याग दी। बहुत दिनों तक पगलाये-पगलाये घुमते रहे मलिकार। फिर मलिकार के जिनगी में हम आ गये। हमारे पाँच लइके (बच्चे) हो गये लेकिन मलिकार कभी हमसे न परेम (प्रेम) से बोले न बतियाये। वे हम पर खाली रौब जमाते रहे और दुनिया वालों के सामने हम मलिकीनियाँ बने रहे।

“ईया, अपना नाम बताओ ना, कब से पूछ रहे हैं?”  झकझोरते हुए रघु ने ईया से पूछा

“का जानी बाबू, मलिकार के पहली पत्नी के नाम पर ही हम वोट डारते आये हैं। हमारा वोटर कारड कभी नाहीं बना।”

“बाबा की पहली पत्नी! तुम्हारे अलावा और किसी से भी उनका बियाह हुआ था!… अच्छा उनका नाम क्या था?”

“हमसे तो किसी ने उनका नाम नाहीं बताया। लेकिन जब वोट डारने (डालने) जाते थे तब वहाँ बैठे हुए पंच पुछते थे कि फुलमतिया नाम है तुम्हारा? हम ‘हाँ’ कहकर वोट डार आते थे”

रघु ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा, “ईया को अपना नाम याद ही नहीं… हा..हा…हा..”

“का फरक पड़ता है नाम से बाबू, फूलमतिया हो या कुछ और… किसमत तो नाहीं बदल जायेगी।” ईया ने मुड़ी घलाये (सर नीची किये) जवाब दिया।

इतने में मलिकार गोहूँ बेचकर हाथ में नोटों की गड्डी लिए घर लौटें और मलिकाइन की ओर बिना देखे रघु के पिता यानी अपने बड़े बेटे रेहन के हाथ में नोटों की गड्डी थमाते हुए कहने लगें, “सम्भालकर रखना, इसके बाद गोहूँ नहीं बिकायेगा। जो भी खर्चा-बरचा हो इसी से चलाना।”

मलिकाइन ने और भी मुड़ी घला (झुका) लिया और खुखड़ी की रखवारी के बहाने खेत की ओर चल पड़ी। आँख से आँसू गिरे बिना मान नहीं रहे थे इसीलिए वह लुकाकर (छिपकर) अपने आँसू पोंछते हुए खुखड़ी की गल्ला के पास चुक्की-मुक्की मारे घंटे भर बैठी रही। फिर खुखड़ी से ढेला झारने के लिए उसे मुअड़ी से पीटने लगी और कोसती रही अपनी मलिकाइन बनने की किसमत को, “गवना में माई-दादा ने इन लोगों को गगरी भरकर सोने-चाँदी की मोहर दी थी और मुझे दो लुग्गा में विदा कर दिया। उनका मानना था कि मैं यहाँ घी-दूध में नहाऊँगी। मुझे रुपये-पैसों की का जरूरत…। उसी दो लुग्गा में गुजारा करती रही, वह भी फट गया। चकती (पैबन्द) लगा लगा कर पहनती रही। दो साल बाद जब दोंगा (गवने के बाद दुबारा विदायी) हुआ तभी नया लुग्गा नसीब हुआ।… बड़े खानदान के इस रईसी पर माई ने अपना कपार (सिर) पीट लिया। तबसे वो ही छुप-छुप कर दो-चार रुपये हाथ पर धर जाती थी।  लेकिन उनके जाने के बाद अफराद (जरूरत से ज्यादा) पैसों के बीच हम पाई-पाई के लिए मोहताज़ रहें। पाँच बेटों को जनमाने के बाद भी हम इतना तरस रहे हैं कि एक रुपये का सिक्का होता तो भुवना के घर कथा हो रहा है, आरती में डाल कर हाथ जोड़ आते।… घर गयी थी कथा में जाने के लिए ही, भुवना की माई बहुत चिरौरी (आग्रह) करके गयी थी। पर मारे लाजन हम केहू से एक रुपये का सिक्का नाहीं माँग पायें। साठ-पैंसठ की उमर हो गयी जिनगी छुछ्छ (खाली) ही बीत गई। एक रुपया का सौ रुपया भी माँगे तो रघुआ के पास से मिलेगा! दाँत पर दाँत रख के जीवन बीता दिया अब बुढ़ौती में का माँगें…।”

“का हो बुढ़ा… खड़ी दुपहरिया में खुखड़ी पीट रही हो। घाम-वाम लग जायेगा।… चलिये सतनारायण बाबा का कथा हो रहा है, सुन आते हैं।” पिंकिया की माई गोबर फेंक कर लौटते हुए बोली।

“तुम चलो… हम आ जायेंगे पाछे (पीछे) से।” कहते हुए मुअड़ी की गति और तेज हो गयी। मन ही मन सोचने लगी, “खुखड़ी तो हमारी जिनगी हो गयी है।… (थोड़ा रुक कर फिर से मन में खयाल आया) हम भी का सोच रहे हैं, हमसे अधिक मोल तो इस खुखड़ी की है। इसके ऊँख से भेली (गुड़) बन जाता है, चीनी-मिल पर गिराने से पैसा मिल जाता है। जब कुछ नहीं बचता है तब खेत जोत कर छोड़ दो, जड़ सूख कर खुखड़ी बन जाती है। खुखड़ी (गन्ने की जड़ सूख जाने के बाद) लवना (चूल्हा जलाने की सामग्री) बन जाता है, और जो खुखड़ी खेत में छूट जाये वो खाद।” मुअड़ी हाथ से छूट कर छटक गयी। मन कर रहा था कि भोकार छोड़ कर (चिल्ला-चिल्ला कर) रो दें। लेकिन रो कर जिनगी में कुछ बदलाव तो आने वाला नहीं।

बगल के खेत से रमूआ की माई ने आवाज लगाई, “ये अम्मा जी, खाना खा लीजिए। ले आई हूँ।”

रमूआ की ईया भिनहिय (सुबह) से खुखड़ी बीन रही थी, उसकी पतोहि (बहू) खाना ले आयी है। धन्य है रमूआ की ईया जो उसे ऐसी पतोहि मिली है। दोनों मलिकाइन के पास खाना लेकर चली आयीं। रामूआ की ईया ने मलिकाइन को खाने की थरिया हाथ में थमाते हुए कहा, “खा लो, काहे खुखड़ी पर अपना रोष दिखा रही हो?”

“भूख नाहीं लगी है। सोचा था कि कथा सुन कर आऊँगी तब खा लूँगी।”

“खा लो, खा लो… हम जानते हैं तुम्हारा दरद, ढ़ेर परानी (बहुत व्यक्तियों) में कौन मन पार रहा है (याद है) कि तुम भुखाइल भी होगी…! भगवान पाँच बेटा, पाँच पतोहि और दर्जन भर नाती-पोता दिए है, पर कौनो सुख-सवारथ तुमको हासिल नाहीं हुआ।”

“ऐसी बात नाहीं है। छोटकी पतोहिया बड़ी नीक (अच्छी) है। खाने के जून (समय) पर खाना-पानी दे देती है, रोज रात में हाथ-गोड़ चाँत (मालिस) देती है। वो तो खुखड़ी चोरी हो रही थी तो रखवारी पर बैठे हैं।” कहने के लिए कह दिया मलिकाइन ने, लेकिन मन ही मन लजा गयी। आखिर मलिकाइन ने खुखड़ी चुराने वाली औरत को पहचान लिया था। बहुत गरीब है, घर में अकेली है। बेचारी दिन भर लवना-लकड़ी का जुगाड़ करके रात में खाना बनाती है। मन कर रहा था कि खुखड़ी उसे ले जाने दें लेकिन चाह कर भी उसे देने के लिए कह नहीं पायी। इसको रखाते-रखाते भिनहिय से दुपहरिया हो गया, लेकिन कौनों पतोहियों ने खाने के लिए पूछा तक नाहीं। रसोइया में जाकर खाना काढ़कर (निकाल कर) खा भी नाहीं सकती। पतोहियों के आ जाने के बाद खाना निकाल कर खाने में लाज आती है। वो सब जो भी रूख-सुख दे दें खाना पड़ता है। सास होते हुए भी कभी भी सासपन नहीं दिखा पायी। दिखाना अच्छा भी नाहीं लगता। अपनी सास से भुगतने के बाद बड़ी मुश्किल से घर में जगह बनायी थी। दाने दाने के लिए तरसना पड़ा था, मार भी खाई थी। तब से तय कर लिया था कि बहुओं को बेटी बना के रखेंगे।… घर की कौनो भी पतोहि जब नयी-नयी दुल्हन बन कर आयी तब बड़ी सीधी-सादी लगती थीं, खूब सेवा-पानी करती थीं लेकिन कुछ दिनों के बाद उनमें बदलाव आ गया। रमूआ की ईया सही कहती हैं कि “उन पर थोड़ा-थोड़ा लगाम लगाकर रखा करो।” लेकिन हमसे ये सब नाहीं हो पाता और पतोहियों को लगता है कि मैं उन लोगों को जानती-मानती नाहीं।… सही तो सोचती हैं सब… आज तक हम उन लोगों को मुँहदेखऊवा (पहली बार मुँह देखने पर उपहार देना) तक नाहीं दे पाये। गहना गुरिया पहले ही सास ने छीनकर ननदों को दे दिया था, मलिकार ने कभी एक्को रुपया हाथ पर नाहीं रखा, कहाँ से देती मुँहदेखऊवा!

“खा लीजिए अम्मा जी” – रमूआ की माई ने टोका। मलिकाइन की कोइयायी आँखों में पानी भर आया। भूख से पेट सटहा बन पीठ में चपक गया था। रोटी-तरकारी खा कर थोड़ी जान में जान आयी।

रमूआ की माई ने रिंकी की बड़ी बहन रोशनी के ससुराल से लौटने के बारे में पूछा, “रोशनी बहिनी तो अपने घर से लौट आयी हैं, कैसी हैं?”

“कैसी होगी हमार बच्चा… ससुराल से लौटी है, यहीं का सूत (कपड़ा) अपने देही पर डार के वापस लौटी है, यहाँ से दिया हुआ एक्को गहना नाहीं दिखायी दिया। बड़ा खानदान समझ के ब्याही गयी थी, लेकिन धनी घर में बेटी-बहू भी धनी हों, ये तो किस्मत का खेल है।” मलिकाइन को अपने दिन याद आ गयें। जिन्दगी भर बड़े घर में गरीबी की मार झेलती रही और सबको शान से बताती रही कि उसके ससुराल वाले कितने धनी-मनी हैं। अब भी वही स्थिति है। इसलिए मायके से भतीजे ने गाभीन भैंस भिजवा दिया था कि उसके बुआ को कम से कम दूध-गान तो मिलता रहेगा। जबसे भैंस बियायी (प्रसव होना) है, घर में दूध ही दूध हो गया। मलिकाइन के लिए वो भैंस परान से भी बढ़कर हो गयी। वह भैंस के चारे-पानी का इंतजाम करती, सबको दूध पिलाती और खुद भी पीती है। उसके पास पूरे अधिकार से कहने के लिए कुछ है तो एकमात्र भैंस है, जिस पर किसी और का अधिकार नहीं है और ना ही किसी को अधिकार जमाने देती है।

2

मलिकाइन को बाछी छुआया (गोदान) जा रहा है। मलिकाइन दोनों हाथों से बाछी की पूँछ पकड़ कर स्वर्ग जाने के लिए नदी पार कर रही हैं लेकिन एक तरफ कंधे पर लटके मुँह से लार चूए जा रहा है। छोटका बेटा उन्हें थामे बैठा है। सबको पता है कि मलिकाइन नाहीं बचेगी। मलिकार सहित घर के सभी सदस्य और गाँव-गड़ा के लोग उन्हें घेरे खड़े हैं। गाँव के कुछ लोग मलिकार को सुझाव दे रहे हैं कि खाना-वाना जल्दी खा लो, वरना मर जायेंगी तो दूध के भात तक खा नाहीं पाओगे। सलाह सुनते ही घर के लोग निपटारे के लिए अपनी-अपनी जगह छितरा गयें। मलिकाइन ने निरीह आँखों से सब देखा और अपने बेटे से लड़खड़ाती आवाज में बोली, “बाबू, हमारी भैंस बेच दो।”

वहाँ पर बैठे लोग हँस पड़े, “अंतिम समय में भइसिया काहे बेचवा रही हो मलिकाइन, नाहीं चाहती का कि कोई और भी तुम्हारे नइहरे से आयी भैंस का दूध-गान पीये…”

“अरे! भइसिया मलिकाइन की परान है”…!

“बाबू, हमारे जीते-जी भैंस बेच दो” सबकी बातों को अनुसना कर फिर से मलिकाइन ने कहा। इस बार सब लोग सन्न हो गये।

“ठीक है माई, बेच देंगे।”

शाम तक गँहकी ढ़ूँढ कर पचास हजार में भैंस बिक गयी। रुपये मलिकार के हाथ में जाते-जाते बचा बल्कि उन्होंने ही अपने छोटे बेटे से कहा, “पूछ लो कि आखिर भैंस बेचवाना क्यों चाहती थी?”

यह पहली बार मलिकार की तरफ से फैसला मलिकाइन के हक़ में था।

छोटा बेटा रुपये लेकर मलिकाइन के पास गया और उनके हाथ में थमाते हुए बोला, “माई, पचास हजार मिले हैं।”

मलिकाइन ने पहली बार इतने सारे रुपये एक साथ देखे थे। वह फूट-फूट कर रो पड़ी। बच्चे की तरह उन रुपयों को सहलाया, सीने से लगाया, अँचरा में गठियाया। उन्हें रोता देख वहाँ बैठे सभी लोगों की आँखें भर आयीं। लेकिन यह बात सबकी समझ से परे था कि वे रुपये लेकर रो क्यों रही हैं? बुढ़ापे में पैसों का इतना लालच कहाँ से घेर लिया मलिकाइन को?

मलिकार दूर से भौचक्के सब कुछ देख रहे थे। मलिकाइन ने घर की सभी बेटियों और बहुओं को बुलाने के लिए कहा। ससुरइतिन लड़कियाँ भी आखिरी समय में मलिकाइन को देखने आ चुकी थीं। घर के सभी सवांग (पुरुष) एक तरफ खड़े थे और सभी बहुएँ और लड़कियाँ मलिकाइन के पैरों के पास आँखों में आँसू लिए खड़ी थीं। सबकी आँखों में जिज्ञासा थी, कुछ सवाल थे। पहली बार सबको मलिकाइन के कुछ कहने का इंतज़ार था। उन सारी जिज्ञासाओं को शांत करते हुए मलिकाइन ने रिंकिया को पास बुलाया और लड़बड़ाती जुबान से कहा, “हमने अपने जिनगी में बहुत गरीबी देखी है। इस घर के आदमी अमीर हैं और औरतें गरीब। कूल-खानदान के अमीर होने से लड़कियों का भाग नाहीं बदलता।… तुम लोग भी हमारी तरह ही गरीब हो।”

औरतों की भीड़ सिसकियों से गूंज उठी। रिंकी के हाथ में रुपये थमाते हुए मलिकाइन ने बात जारी रखी, “आज तक हम तुम लोगों को कुछ नाहीं दे सकें। इन्सान के पास जो होता वही दूसरों को देता है।… हमारे पास आँसू, सबर और दरद था, हम यही तुम सबको दे पायें। आखिरी समय में हमारे पास तुम सबको देने के लिए कुछ भी नाहीं है।… भइस हमारे मायके से आयी थी, वही मेरी पूंजी थी…। रिंकी… हमरे जीवन की पूंजी हमारे मरने के बाद घर की सभी औरतों और लइकनियों में बराबर-बराबर बाँट देना।”