1

इस समय सबका दुःख साझा है
सुख,
किसी ग़लत पते पर फँसा हुआ शायद
सबकी प्रार्थनाओं में उम्मीद का प्रभात
संशय के बादल से ढका पड़ा है

समय
शोर को भेद कर
सघन मौन रचता है

यह धरती
अपनी प्रमाणिकता में
सदियों के बन्धन से मुक्त
जीवन के दृश्य रचती आ रही,
इस वक़्त
उस दृश्य से
आदमी का चेहरा ग़ायब है!

2

इस वक़्त
हमने अपने चेहरे उतार रखे हैं
और आइनों को देखना ज़रूरी नहीं,
यह समय
आइना बन सामने खड़ा है

हम कितना तैयार होते रहे अब तक
लेकिन पता चला इन दिनों
हमारी कोई तैयारी नहीं थी।

हमें रोज़ लौटना था घर
अब लौटने की कोई वजह नहीं
रुके हुए पानी की टीस
आज नसों में लहू की जगह बहती है।

यह तमाम परिभाषाओं के रद्द होने का समय है
जिन उक्तियों की अंगुली थामे
बढ़ते रहे अब तक
उन पर रुककर सोचने का समय है।

3

बेवजह
घड़ी चलती रहती है
दिन रात सरकता रहता है
हम इस पहर से उस पहर का सफ़र
सदियों में तय करते हैं

यह उनींदा दिन
आँकड़ों के संचयन में लिप्त
मृत्यु की आहट को अनसुना करता
थककर बैठ जाता है

किसानों का दुःख है
खेतों में बीज नहीं गिरे

जो रोज़ी=रोटी से दूर हैं
वो घर नहीं पहुँचे

दरवाज़े का दुःख है
कि कोई नहीं खोलता घण्टों तक

परदों की हलचल से
नसों में तेज़ होता रक्त संचार

मेरा दुःख
खिड़की खोलकर भी क्या होगा!

खोलती हूँ हर शाम फिर भी
चिड़िया अपने हिस्से
का दाना चुग लेती
कटोरी-भर पानी पी लेती

इन दिनों इसी से होता है
वजूद के होने का एहसास
इस काट खाने वाले समय से
अपने सुख का हिस्सा
छाँट लेती।

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नताशा
जन्म- 22 जुलाई 1982 (बिहार) | शिक्षा- एम. ए. हिन्दी साहित्य, (पटना वि.वि.) बी.एड | सम्मान- भारतीय भाषा परिषद् युवा कविता पुरस्कार (कोलकाता) फणीश्वर नाथ रेणु पुरस्कार (पटना विवि)

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