वो किसी
धूर्त मदारी की तरह
वादों की डुगडुगी
बजाते हुए
पीटते हैं ताली,
टटोलते हैं
हमारी जेबें,
तोड़ते हैं
आज़ाद क़लमें,
जाँचते हैं
हमारे शब्द,
सूँघते हैं
हमारी थालियाँ,
बाँटते हैं
हमारे त्यौहार,
बदल देते हैं
इतिहास की किताब,
गिनते हैं हमारे निवाले
ताकि पूछ सकें
कहा से आया भरपेट भोजन

वो समझाते हैं,
कितने भोले हैं हम
वो मनवाते हैं
हमी हैं
सबसे बड़े चोर
वो छीनते हैं
हमसे असहमति का हक़
वो ख़ुद को मानकर
हमारा तारणहार
करते हैं क्रूर प्रयोग
वो हमें
जताते हैं
चौंकाते हैं
डराते हैं
हम
जैसे
मन्दबुद्धि बालक
ख़ुश होते हैं
चौंककर सहमते हैं
डरकर रोते हैं
मगर विरोध में उठते नहीं
पलटकर झपटते नहीं
किन्हीं
अच्छे दिनों के इन्तज़ार में
मदारी की डुगडुगी पर
ताली बजाकर
नाचते हैं—
लोकतन्त्र
किसी असहाय दर्शक-सा
बेचैन है।

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