‘Main Aur Prem’, short poems by Ruchi

वो नाराज़ है मुझसे इन दिनों
क्योंकि मैं समेट रही हूँ ख़ुद को
उसकी चौखट से, उसके लिए।

***

वो मिलना चाहता है मुझसे
पर मैंने मना कर दिया और
इस तरह संजो ली मैंने
इक उम्मीद भविष्य में।

***

हम दोनों की नज़रों के समागम से,
ये जो जुड़वा मुस्कान जन्मी है,
चलो इसको हम नाम दे दें,
अवैध घोषित होने से पहले।

***

हमारी बातों के टुकड़े जोड़
एक तस्वीर उकेर सजाना
चाहती थी मन की दीवार पर,
एक टुकड़ा कम था, तस्वीर अधूरी है।

***

मैंने अपनी विरासत में
छोड़ रखा था प्रेम,
लोगों ने धराशायी कर दिया,
अब वही लोग चुन रहे हैं,
खण्डहर में प्रेम के अवशेष।

***

मैंने चाहा सदैव तुम्हें अपनी खिड़की-भर,
खिड़की-भर ही देखा, छूआ, महसूस किया,
दरवाज़ों से प्रेम होता है अन्दर या बाहर,
खिड़की से अपना बना लिया मैंने प्रेम।

***

पहले मैंने उसे बिना जाने प्रेम किया,
और अब मैं उसे जानने की कोशिश में हूँ,
प्रेम दुबका सहमा, प्रतिक्षारत है
पक्षीय फैसले के लिए।

***

वो मिलकर महसूस करना चाहता है
प्रेम की सजीवता,
और मैं बिना मिले जीना चाहती हूँ
निर्जीव प्रेम।
सुना है निर्जीव की आयु लम्बी होती है।

***

मैंने तुम्हारे प्यार को महसूस किया मन पर,
तुमने मेरा प्यार महसूस करना चाहा जिस्म पर,
भावनाओं का बलात्कार कभी सुना है क्या।

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