“सुनो! मेरे सपनों से होकर वह ट्रेन गुजरती है… वह मेरे मन की अंधेरी सुरंग में दौड़ती है…”

मैं पहली बार उससे हजारों लोगों की ऐसी ही भीड़ में मिला था। दोनों लड़कियां थोड़ी बदहवास सी प्लेटफॉर्म पर खड़ी थीं। एक कुछ ज्यादा घबरायी हुई लग रही थी। माथे पर पसीने की बूंदे उभर आई थीं। होठ कांप रहे थे, जैसे कुछ बुदबुदा रही हो। शाम थी और हमेशा की तरह ट्रेनों की आवाजाही अचानक बढ़ गई थी। एक मेट्रो अभी अपने दरवाजे से इनसानों को उगलकर आंखों से ओझल होती कि अगले प्लेटफॉर्म पर हुंकार के साथ धड़धड़ाती हुई दूसरी मेट्रो पहुंच जाती थी। झटके से सभी दरवाजे खुलते और देखते-देखते लोग ही लोग प्लेटफॉर्म पर बिखर जाते। तेजी से लपकते-भागते लोगों का ये सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता था। इस भागती भीड़ में उसकी उड़ती निगाहें मुझ पर टिकीं और वह मुझे अपलक देखती रही। उसके दोनों तरफ से बुजुर्ग, बच्चों गोद में टिकाये या उनका हाथ खींचती औरतें, टाई अटकाए बिखरे बालों वाले सेल्स एक्जीक्यूटिव और ईयरफोन झुलाते लड़के-लड़कियां सीढ़ियों की तरफ लपकते जा रहे थे। उसने हाथ मेरी तरफ उठाया, जिसमें उसके शरीर और होठों की तरह ही कंपन था। मैं लोगों के धक्के खाता उनके करीब पहुंचा और साथ खड़ी लड़की की तरफ सवालिया निगाहें दौड़ाईं।

“अ गाइ अटैक्ड हर… अभी-अभी इसका बैग छीनकर भाग गया…” बगल में खड़ी लड़की मेरे कुछ पूछने से पहले बोल पड़ी। ठेठ दिल्ली वाली लड़की। दबी रंगत, पतली-दुबली, कंधों तक गिरते खुले बाल, आंखों में काजल, सिगरेट से संवलाए होठ, शर्ट-जींस के साथ गले में स्कार्फ और कंधे पर एक बैग। हम अगली मेट्रो से उमड़ी भीड़ से बचने के लिए किनारे खिसक आए और दीवाल से सटकर खड़े हो गए।

“कैसे? मेट्रो स्टेशन पर होता नहीं ऐसा…” मैं थोड़ा हैरान था।

“उसने अचानक बैग खींचा और पता नहीं कहाँ गायब हो गया। चेहरा भी नहीं देखा… हो सकता है फिर मेट्रो में घुस गया हो।”

“तुम इनकी दोस्त हो?” मैंने पूछा।

“नहीं। मेट्रो में हम देर से साथ-साथ थे तो बातें करने लगे। नीचे उतरते ही ये सब हो गया। अभी ये बहुत डरी सी है।”

“नीचे आओ। इन्हें पानी पिलाते हैं। कंप्लेंट भी कर देंगे।”

“नहीं…” उसने पहली बार कुछ बोला। थोड़ी लरजती मगर भीतर दृढ़ आवाज में कहा, “जरूरत नहीं…” और आंखें उठाकर मेरी तरफ देखा। घनी काली पलकों वाली आंखें। ऐसी आंखें जिनमें काजल की जरूरत नहीं थी। सुर्खी फूटता गोरापन और हल्के घुंघराले घने बाल। कान में झूलते बड़े ईयरिंग्स। नाक और माथे के ऊपरी हिस्से पर उभर आई पसीने की बूंदें।

“तुमको जाना कहाँ है?” मैंने पूछा। “मैं छोड़ दूं?”

वह चुप रही।

हम नीचे की तरफ बढ़े। उसने दूसरी लड़की का हाथ थामे रखा। शायद पैरों में कंपन अब भी था। मैंने सीढ़ियों पर उसे सहारा देने के लिए हल्के से उसकी बांह पर हाथ लगाया। उसकी त्वचा एकदम ठंडी और थोड़ी नम थी। हालांकि ये जून के तपते दिन थे। मेट्रो का यह रूट जमीन के भीतर नहीं था। स्टेशन काफी खस्ताहाल रहता था। सीढ़ियां सीधे सड़क पर खुलती थीं और उनके धूल से अटे निचले हिस्से पर सिगरेट के टुकड़े, चिप्स के पैकेट और चाय के डिस्पोजेबल कप बिखरे रहते थे।

धरती पर कदम रखते ही एक नए किस्म के सैलाब का सामना करना पड़ता था। एक-दूसरे के पीछे हार्न बजाती, रेंगती सैकड़ों कारें, फटफटाते आटो और फुटपाथ पर एक के पीछे एक तेजी से चलते लोग ऐसे दिखते जैसे किसी एक सतह पर पानी की अलग-अलग धाराएं बह रही हों। सड़क जगह-जगह से खुदी होने और फैले केबल की वजह से यह आवाजाही और बेतरतीब हो गई थी। दोनों तरफ भिखारी और आवारा कुत्ते बैठे मिलते थे। उनको बचाते हुए आगे बढ़ना पड़ता था। हम कतार बनाकर खड़े आटो और रिक्शों के बीच से होते हुए पोल के नीचे एक छोटी सी दुकान पर पहुंचे। मैंने उसकी तरफ पानी की बोतल बढ़ाई। उसने पहले अपने चेहरे पर पानी का छींटा मारा फिर दो घूंट गले के भीतर उतारकर मेरी तरफ निगाह घुमाई।

“मेरा मोबाइल भी चला गया…”

लगा अपने-आप से बोल रही है।

“तुम्हें जाना कहाँ है? जहाँ कहो मैं छोड़ दूंगा…” मैंने पूछा।

“आज ही यहां पीजी फाइनल होना था, एडवांस भी देना था। पैसे, कार्ड सब बैग में था।” उसने जवाब दिया।  

“सुनो, तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो…” साथ खड़ी लड़की बोली, “अभी मेरा कोई रूम पार्टनर नहीं है। बोल दूंगी कि तुम मेरी कज़न हो।”

“यह ठीक रहेगा।” मैंने समर्थन किया।

“आप भी क्या यहीं रहते हैं?” उसकी नयी-नयी बनी दोस्त ने पूछा।

“हां, मैं समर!” मैंने परिचय दिया।

वह तपाक से बोली, “मैं आयुषी हूँ…”

“…आपका नाम?” मैंने उसके साथ वाली लड़की से पूछा।

“मैं?” वह थोड़ा ठहरी। बगल में झन्न से गुजरती किसी तेज रफ्तार गाड़ी की तरह उसका नाम मेरे कानों से टकराया। “…मेरा नाम कावेरी है।”

कुछ सेकेंड तक वह चुप रही फिर रुक-रुककर एक-एक वाक्य बोलना शुरू किया। जैसे स्टूडेंट मौखिक परीक्षा में बोलते हैं, “यहां लीगल सर्विसेज की तैयारी के लिए आई हूँ। संदीप लॉ कोचिंग क्लासेज में लास्ट वीक एडमीशन लिया था। पीजी में बात भी हो गई थी। आज पैसे देकर मुझे शिफ्ट होना था। वैसे मैं लखनऊ से हूँ। पापा का स्पोर्ट्स गुड्स का बिजनेस है।”

“तो कावेरी हम चलते हैं…” आयुषी बोली, “और समर थैंक्स फॉर योर सपोर्ट… वैसे क्या हम नंबर एक्सचेंज कर सकते हैं?”

“बिल्कुल, मैं ईस्ट की तरफ सी ब्लॉक में रहता हूँ। कोई जरूरत हो तो फोन करना…”

मैं उन दोनों को जाते हुए देखता रहा। दिन ढल चुका था और दुकानों की लाइट और साइनबोर्ड चमकने लगे थे। आसमान में एक मटमैला उजाला बाकी था। कावेरी ने किसी यकीन की तरह अभी भी आयुषी का हाथ थाम रखा था। ऊपर बहुत ऊंचाई से कोई रह-रहकर किसी कोचिंग सेंटर के पर्चे हवा में फेंक रहा था, जो तैरते हुए धीरे-धीरे जमीन पर बिखर रहे थे। कावेरी और आयुषी हवा में तैरते पर्चों और रंग-बिरंगी रोशनी में डोलती परछाइयों के बीच कहीं खो गए।

***

अगली सुबह मोबाइल की घंटी से मेरी नींद टूटी।

“हैलो! आयुषी स्पीकिंग। हाऊ आर यू? वी वांट टु से थैंक्स टू यू…।” उधर से चहकती हुई आवाज आई।

“ओह, थैंक्स… तुम्हारी फ्रैंड? कावेरी ठीक है न?” मेरी समझ में नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं।

“फैंटास्टिक! हमने सोचा आपको अपना हालचाल बता दें… आप हमारी बहुत चिंता कर रहे थे न?” आयुषी की आवाज में शरारत थी। पीछे से कुछ बोलने और खिलखिलाने की आवाज आई।

“…लो ये लड़की आपसे बात करना चाहती है।”

“अरे… क्या बेवकूफी है?” शिकायती लहजे में कावेरी की आवाज आई।

कुछ सेकेंड की खामोशी… फिर एक धीमी सी आवाज, “हैलो!”

“हाइ!”

“कैसे हैं?”

“बिल्कुल ठीक!”

“आप आज मिलेंगे? मेरा मतलब अगर मिलना चाहें…”

“फोन मुझे दे…” आयुषी की आवाज आई।

आयुषी फोन छीनकर बोली, “अरे यार, ये नवाबों के शहर वाली तो नवाबों वाले अंदाज में धीरे-धीरे, नज़ाकत से बातें करेगी, उसको सुनने और समझने में भी पूरा दिन निकल जाएगा। आज संडे है। तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? दोपहर में कहीं मिलते हैं। बोलो कहाँ? मैं सजेस्ट करूं? वीथ्रीएस के कॉफी शॉप में मिलते हैं, तीन बजे… इट्स ओके विद यू?”

***

शाम तीन बजे। तीनों धमाकेदार संगीत और अपार कोलाहल से भरे मॉल के फूड कोर्ट में साथ बैठे थे। हमें एक-दूसरे से कुछ कहने के लिए ऊंची आवाज में बोलना पड़ रहा था। कल तीनों जितने सदमे में थे आज उतने ही जोश से भरे। आयुषी अपने बारे में बता रही थी। वह एक डिजिटल मार्केटिंग कंपनी में काम करती है और इंदौर की रहने वाली है। मैंने भी बताया कि मैं इलाहाबादी हूँ। दिल्ली यूनीवर्सिटी से रूरल डेवलपमेंट में रिसर्च कर रहा हूँ। खाली वक्त में स्केच बनाता हूँ और न्यूजपेपर्स और वेबसाइट्स के लिए लिखता भी हूँ।

“और यहाँ दोस्ती ऐसे ही होती है। देखो, कल तक हम तीनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे…” आयुषी ने कहा, “अब साथ बैठे हैं।”

“पर मुझे लगता है कि ऐसा सचमुच नहीं होता… हम कई बार बिना मिले भी एक-दूसरे को जान रहे होते हैं।” कावेरी कॉफी मग में स्टिक घुमाते हुए बहुत देर बाद बोली, “इसीलिए करीब भी आते हैं… पर हमें यह पता नहीं होता है।”

“अरे हां, मैं बताना भूल गई… ये लड़की फिलॉसफर है। साक्रटीज़, एरिस्टॉटल के बाद इसी का नाम लिया जाता है। ये बात भी हमें पता नहीं होती है।”

कावेरी ने उसे घूरकर देखा और आयुषी खिलखिलाकर हंस पड़ी।

शायद उस शाम सूरज ढलने से पहले हम वाकई दोस्त बन गए थे। क्योंकि लौटते वक्त मेट्रो में हम तेज आवाज़ में बहस कर रहे थे। ज्यादातर बहस मेरे और आयुषी के बीच होती रही। कावेरी हमें चुपचाप सुनती रहती थी और बीच-बीच में कुछ बोल पड़ती।

लौटते समय आयुषी जिद करके मुझे अपने रूम ले गई। उसका कमरा फर्स्ट फ्लोर पर था। यह कुछ-कुछ चौकोर सा कमरा था, जिसकी दोनों दीवालों से बेड सटे हुए थे। दोनों बेड पर सुंदर प्रिंटेड चादरें बिछी थीं। कावेरी के सिरहाने एक काले रंग की छोटी सी डायरी पड़ी थी। बेड से लगी खिड़की अपार्टमेंट के पीछे की तरफ हरियाली में खुलती थी। कावेरी ने अपनी खि़ड़की को छोटे-छोटे लकड़ी के खिलौनों से सजा दिया था। एक लकड़ी का रोबोट जिसके सिर पर स्प्रिंग वाला एंटीना छूने पर हिलता था। लकड़ी की बाइक, विंटेज कार, छोटी सी लकड़ी की बतख, रोड रोलर, काठ के रंग-बिरंगे राजा-रानी और एक नन्हा सा हाथी जिसके पैरों में पहिये लगे थे।

रूम से लगा एक छोटा सा किचन था। आयुषी सबके लिए कॉफी बनाने लगी। कावेरी चेंज करने वॉशरूम में चली गई। कावेरी के बिस्तर पर बैठे-बैठे मैं खिड़की से बाहर की तरफ देखने लगा। इस शहर में कोई मौसम नहीं होता। मौसम शहर के कुछ चुनिंदा कोनों में घबराए हुए अजनबियों की तरह दुबक जाता है। मौसम के उन गोपनीय ठिकानों में कोई लंबी सड़क भी हो सकती है, तो कोई मोड़, पार्क के पास का हिस्सा या किसी पुराने पेड़ की छांव भी। हम किसी छांव से भरी गली में मुड़ते हैं और अचानक सड़क पर कुछ पत्ते टपकते हैं। ऊपर देखते हैं और पाते हैं कि सरसराते हुए पेड़ों से छनती बयार हम तक हौले-हौले पहुंच रही है। अचानक मौसम किसी संकोची बुजुर्ग की तरह धीरे से आपके कानों में कुछ फुसफुसाता है।

“अकेले बैठे क्या सोच रहे हो?”

कावेरी की आवाज सुनकर मैं चौंक पड़ा। वह बिल्कुल मेरे पास खड़ी थी। धुले हुए स्निग्ध चेहरे पर गीली बालों की लटें चिपक गई थीं। उसने लाइट ब्लू टी-शर्ट और ऑफ व्हाइट शार्ट्स पहन रखे था।

“कुछ खास नहीं, सोच रहा था कि बहुत सालों बाद यह शाम दिल्ली मे बिताई मेरी कुछ सबसे बेहतरीन शामों में से एक है।”

“इसके लिए तुम्हें हम लड़कियों को थैंक्स बोलना चाहिए।” वह थोड़ा सा मुस्कुराई और मेरे बगल में बैठते हुए बोली, “ये मुलाकातें, दोस्ती, ये कभी न खत्म होने वाली बातें… अचानक नहीं होता सब कुछ। किन्हीं धागों से हम जुड़े होते है।”

“पहले से?”

“हां, मैंने कहीं पढ़ा था। हम भले एक-दूसरे के चेहरे नहीं पहचानते पर भरोसा हो जाता है। जब बातें होती हैं तो कैसे खुलते जाते हैं।”

मैं चुपचाप उसे सुनता रहा।  

“याद है, कल हजारों की भीड़ में मैने सिर्फ तुम्हें आवाज देनी चाही, क्यों? क्योंकि सभी भाग रहे थे। तुम ठहरे हुए थे। तुम मेरी सतह पर थे। जो मुझसे बात कर सकते थे।”

“यह सिर्फ एक संयोग भी तो हो सकता है कावेरी?” मैंने कहा।

“हैव कॉफी, गाइज़!” आयुषी ट्रे लेकर आ पहुंची और हम इस तरह चुप हो गए जैसे किसी अनजान घर के दरवाजे पर दस्तक देकर उसके खुलने का इंतज़ार कर रहे हों।

“कावेरी बहुत सुंदर कविताएँ लिखती है। कभी सुनना…” आयुषी मुझसे बोली, “देखो, मैंने चौबीस घंटे में इसे कितना कुछ एक्सप्लोर कर लिया।”

सचमुच?

उस शाम ट्यूबलाइट की रोशनी में बैठे हम तीनों प्यालों से उठती कॉफी की खुशबू के बीच क्या एक-दूसरे को एक्सप्लोर कर रहे थे? या अपनी ही जिंदगी के कुछ अनजान दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे…

***

उस रात अपने कमरे पर लौटा तो कुछ खाली-खाली सा लगा। जैसे उस कमरे में, उस तकिए और डायरी के पास, उन लकड़ी के खिलौनों के पास… कुछ छूट गया है। सुबह अपने-आप नींद खुल गई। मैं दिन में कहीं नहीं गया और अपने कमरे की बालकनी में खड़ा ठूंठ की तरह छतों पर उगे मोबाइल टावर और कुकरमुत्तों सी काली-सफेद पानी की टंकियों को देखता रहा। अचानक मुझे यह जानने की तीव्र इच्छा हुई कि कावेरी ठीक इस वक्त क्या कर रही होगी। बार-बार इच्छा होती थी कि उसकी आवाज सुनूं। वो हल्की खनकदार आवाज… और जब बात खत्म हो जाए तो उसके अधखुले होठों को देखता रहूँ।

कई दिनों तक जब चलती हुई मेट्रो के बगल से धड़धड़ाती हुई दूसरी मेट्रो गुजरती तो मुझे ऐसा लगता कि जैसे मैंने दूसरी ट्रेन के पलक झपकते ओझल होते चेहरों के बीच उसे भी कहीं देखा है। मेरी बेचैनी बढ़ जाती। लगता कि मुझे उसके साथ होना चाहिए, कुछ कहने-सुनने के लिए नहीं उसकी बगल में चुपचाप बैठे रहने के लिए। शहर की रोशनी का प्रतिबिंब उसके माथे पर उभर आई पसीने की नन्ही बूंदों पर जगमगाता हुआ देखने के लिए। इस बीच मेरी आयुषी से एक-दो बार बात हुई। हर बार हमने मिलने का प्लान बनाया मगर वह किसी न किसी वजह से कैंसिल होता गया। मैं सफेद कागज पर उसे साकार करने की कोशिश करता… मगर वह हमेशा मुझे टुकड़ों-टुकड़ों में याद आती। कभी उसके घुंघराले बालों से झांकते ईयरिंग्स, कभी कंधे पर लटका उसका बैग और कभी उसके हाथ।

देखते-देखते दो हफ्ते बीत गए। जून का मौसम करवट लेने वाला था। तपन में एक बेचैनी भी शामिल हो गई थी। कभी भी मानसून के बादल आसमान में घुमड़ने वाले थे।

***

“हैलो…!”

“हां…?”

“मैं कावेरी बोल रही हूँ!”

“कावेरी? कहां हो आजकल?”

“मैं… नीचे खड़ी हूँ।”

“नीचे कहां?”

“ये तुम जहां रहते हो न… वहीं… नीचे गली में…”

“अरे, कमाल कर दिया… तुम… तुम ऊपर आओ न…”

“नहीं, तुम नीचे आ जाओ, थोड़ा टहलते हैं और बातें भी कर लेंगे…”

मैंने नीचे जाने के लिए दरवाजा खोला तो चौंक गया। कावेरी सामने ही खड़ी थी। शाम की रोशनी और गर्म हवाओं से उसके चेहरे की रंगत सुर्ख हो रही थी। माथे पे दिये की लौ जैसा पीला-सिंदूरी टीका दमक रहा था और सूरज की तिरछी रोशनी से बालों पर चमकीली रेखा-सी लपलपा रही थी। और नाक पर वैसी ही पसीने की बूंदे टिकी थीं, जैसी मैंने पहली बार देखी थीं।

“प्लान चेंज कर दिया, सोचा पहले ऊपर आकर तुम्हारा रूम देख ही लूं…”

वह भीतर रखी कुर्सी पर बैठ गई और इत्मिनान से निगाहें घुमा-घुमाकर मेरे कमरे को देखने लगी। उसकी निगाह कविताओं की एक किताब पर टिक गई। यह मारीना त्स्वेतायेवा की कविताओं का अनुवाद था।

“ये किसकी कविताएं हैं?” उसने किताब को उलटते-पलटते कहा।

“ये एक रुसी कवियित्री मारीना त्स्वेतायेवा की कविताओं का हिन्दी अनुवाद है।“

पन्ने पलटते हुए कावेरी एक कविता पर रुक गई। उसका शीर्षक था, ‘पेरिस से’। वह उसकी अंतिम पंक्तियां पढ़ने लगी।

“भव्य खुशहाल पेरिस में/ मैं सपने देखती हूँ घास, बादलों और बरसात के/ दूर से आते कहकहों के और पास की छायाओं के/ मन में गहरा बसा है कहीं दर्द पहले की तरह”

“सुंदर कविताएं हैं न? मैं यह किताब पढ़ने के लिए ले जा रही हूँ।”

“जरूर, अब तुम आराम से बैठो, मैं नीचे से कुछ लाता हूँ।”

मैं लौटा तो देखा कावेरी बेड पर अपनी काली डायरी में झुकी कुछ लिख रही है।

“सुनो…” उसे सिर उठाकर बच्चों जैसी मुस्कान के साथ कहा, “अभी-अभी कुछ लिखा है, सुनोगे?”

“इतनी जल्दी कुछ लिख भी लिया?”

“हां, मैं हाइकू लिखती हूँ। हाइकू जानते हो? छोटी कविताएं, जापानी स्टाइल में।”

“हां, मैंने कुछ-कुछ अंगरेजी और हिन्दी में पढ़ी भी हैं, तुमने कैसे सीखा?”

मैंने उसे कोल्ड ड्रिंक थमाई और उसके सामने बैठ गया।

“मेरी मौसी कविताएं लिखती थीं। हायकू भी लिखती थीं। उन्हें देख-देखकर मैंने भी अपनी डायरी में लिखना शुरू कर दिया। हालांकि मम्मी-पापा को मेरा लिखना कभी पसंद नहीं था, पर नानी कहती थीं- बेटा तू लिख…!”

“सुनाओ तुमने क्या लिखा है?”

उसने अपनी डायरी पर निगाहें टिकाईं और पल भर बाद कहा, “अभी नहीं।”

कावेरी उठकर खड़ी हो गई। उसने मेरा हाथ पकड़कर खींचा और कहा, “चलो न! नीचे घूमकर आते हैं।”

हम नीचे उतर आए। यह इलाका गलियों में बसा हुआ था। खूब चहल-पहल रहती थी। वह मेरा हाथ थामे भीड़ में बढ़ती चली जा रही थी। जैसे यहां के हर मोड़ से परिचित हो। खाने-पीने की दुकानों से कड़ाही में गर्म होते तेल की खुशबू गली में फैल रही थी। हम एक के बाद एक तंग गलियों में घुसते गए।

“कावेरी, तुम सीधे अपने रूम से आ रही हो? आयुषी को अपने साथ क्यों नही लाई?” मैं अचानक पूछ बैठा।

“तुम कुछ देर के लिए सिर्फ मेरा हाथ पकड़कर इन गलियों में चल नहीं सकते?”

मैंने फिर उससे कुछ और नहीं पूछा। चुपचाप साथ चलता रहा। हम उधर से गुजरने लगे, जहां रिहाइशी घर बने थे। औरतें, दौड़ते हुए बच्चे, घंटियां बजाती साइकिलें के बीच हम आगे बढ़ते रहे। मैं दो साल से इस इलाके में था पर कभी इस तरह से गलियों में नहीं घूमा। हमारे सिर के ऊपर केबल का जाल झूल रहा था। यहां हर गली में लताओं की तरह मोटे केबल फैले हुए थे। कहीं-कहीं तो ये इतने नीचे तक फैला हुआ था कि लगता था कि हमारे सिर से टकरा जाएगा। प्लास्टिक की ये लताएं नुक्कड़ पर बने बिजली खंभों में जाकर बुरी तरह उलझ जाती थीं। लगता था कि बहुत सारी चिड़ियों ने वहां एक साथ घोसला बना रखा है और वहां से फिर अलग-अलग दिशाओं में उनकी शाखाएँ-प्रशाखाएं फैल जाती थी। जाने कब अंधेरा हो गया। हम देर तक उन गलियों में घूमते रहे और घरों से डूबती-उतराती आवाज़ों को सुनते रहे।

“अब मैं चलती हूँ। मुझे लेफ्ट से जाना है न? मैं रात को अक्सर रास्ता भूलने लगती हूँ…”

हम वापस अपने घर के मोड़ पर खड़े थे।

“कल मैं तुम्हें अपनी फेवरेट जगह ले चलूंगी, शाम को बैठेंगे वहां… तब मैं अपनी कविताएं भी सुनाऊंगी।”

“कौन सी जगह है वह?”

वह मेरे थोड़ा करीब आ गई। उसकी आंखें चमक रही थीं।

“अपनी स्केचबुक लाना। तुम्हें जरूर पसंद आएगी वो जगह। इस शोर से जब मैं थक जाती हूँ तो वहीं चली जाती हूँ। वहां एक पुराना सा पीपल का पेड़ है। ढेर सारी चिड़ियों का बसेरा है। दूर तक फैले फूलों के खेत के पास। यमुना के किनारे…”

***

समर, तुम्हें देखकर मुझे ऐसा क्यों लगा, जैसे मैं तुम्हें जानती हूँ? तुमसे पहले कभी मिल चुकी हूँ? मुझे पता है कि तुम कैसे मेरी तरफ आओगे, कैसे बोलोगे… सब कुछ…”

हम यमुना के किनारे जहां खड़े थे, वहां पीपल का एक बहुत पुराना सा पेड़ था। जिसकी जड़ें लगभग ढह चुके एक पुराने से मंदिर में फैल चुकी थीं। उसके आसपास एक टूटा हुआ चबूतरा था। यहां नदी का पानी अपेक्षाकृत साफ था। शाम ढल रही थी। दूर तक फैली रेत, उसके आगे फूलों के खेत नजर आ रहे थे।

“जब मैं कभी परेशान होती हूँ तो यहीं आ जाती हूँ।”

हम चुपचाप हाथ में हाथ डाले रेत पर टहलते रहे। दूर पुल पर रेंगती बत्तियों को देखते रहे। सांवले आसमान में परिंदे छोटी-छोटी टुकड़ियों में हमारे ऊपर से उड़ते हुए दूर क्षितिज के धुंधलके में खोते जा रहे थे। हवा में ठंडक बढ़ गई थी।  

“सुनो मैंने कुछ लिखा है…” उसने टूटे चबूतरे पर बैठकर अपने बैग से वही काली डायरी निकाली। शाम के नीम-उजाले में अपनी आंखें डायरी के पन्नों पर टिका ली और बोली, “सुनो…”

“चलो एक खेल खेलते हैं
और हम गुम हो जाते हैं
घने हरे पेड़ों के झुरमुट में
धुएं में, नदी किनारे फैली रेत में
या किसी अंधी गली में
जहां सभी घरों के दरवाजे बंद हों”

मैं बगल में बैठा चुपचाप उसे सुनता रहा। पूरब की तरफ आसमान गहरा सांवला हो चुका था। आसपास कोई नजर नहीं आ रहा था। दूर फूलों के खेत में एक आठ-नौ साल की बच्ची दौड़ती हुई जा रही थी। कावेरी मेरे बहुत करीब थी। उसके बालों और कपड़ों से उठती खुशबू मेरी हर सांस के साथ भीतर बसती जा रही थी। मेरे होठ उसके कानों के बहुत करीब थे। इतने कि मैंने बहुत हौले से अपने होठों से उसके कानों को छू लिया।

वह एकदम सकपकाकर खड़ी हो गई। उसकी सांसें तेज-तेज चलने लगीं। चेहरे पर हल्की सी शर्मिंदगी का भाव आ गया था। मुझे अजीब ग्लानि सी महसूस हुई।

“ऑयम सॉरी!” उसने मुझसे कहा, “मेरी कुछ तबियत ठीक नहीं है।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ पल हम चुप रहे। चिड़ियों की आवाज और दूर से आते ट्रैफिक के शोर को सुनते रहे।

“मुझे फोबिया है।“ उसने कहा, “जब कोई मेरे बहुत करीब आता है तो मुझे घबराहट सी होने लगती है। सांस रुकने लगती है।”

“तुमने कभी डाक्टर को दिखाया?”

“दवायें ले रही हूँ।”

“कावेरी… तुमने कभी अपने बारे में नहीं बताया?”

“रोज ही तो बोलती हूँ… तुम तो चुपचाप सुनते रहते हो।”

“मेरा मतलब… तुम्हारी फैमिली के बारे में… मम्मी… तुम्हारे पापा?”   

“सुनो, कल मिलें?” उसने मेरी बात काटते हुए कहा।

“कहां?”

“वहीं, मेट्रो स्टेशन पर…”

***

और उसके बाद हम लगभग हर रोज किसी अनजान सफर पर निकल जाते थे। एक ऐसा सफर जिसकी कोई मंजिल नहीं थी। हम भीड़ को चीरते हुए मेट्रो के भीतर घुस जाते। कोई कोना थाम लेते। मौका मिलता तो किसी कोने में बैठ जाते और वह मेरे कंधे से सिर टिकाकर आंखें बंद कर लेती। मेरे हाथों में अक्सर एक छोटी सी स्केचबुक और कोई किताब होती और उसके पास डायरी। मेट्रो भागती रहती। धरती पर… धरती के ऊपर… अंधेरी सुरंग में। साफ चमकते प्लेटफॉर्म, भीड़ वाले प्लेटफॉर्म, सूनसान प्लेटफॉर्म। कभी बगल से दूसरी मेट्रो धड़धड़ाती तो कभी पुल आ जाता। भीड़ का रेला भीतर आता, बाहर जाता। लोग बदल जाते, चेहरे बदल जाते, बातें बदल जातीं।

मुझे पता होता था कि कब पंजाबी आंटी अपनी मजबूत कद-काठी वाली लड़कियों के साथ मेट्रो में प्रवेश करेंगी और लेडीज सीट पर कब्जा करेंगी, कब अकबकाए बिहार और यूपी के कारीगर और मजदूर अपने बैग और पोटली समेटे झुंड बनाकर भीतर आएंगे, कब अपने में खोई लड़कियां चढ़ेंगी और कब 55-60 साल के बुजुर्ग। सबके भीतर आने का वक्त तय था। जगह तय थी। उतरने के ठिकाने तय थे। हम अपनी मुलाकातों में कभी रुकते नहीं थे। चलते जाते थे। ऐसा लगता था जैसे कि वह रुकना नहीं चाहती। मेरा हाथ थामे भटकते रहना चाहती है।

“यहां मैं खुद को खुश पाती हूँ। यहां कोई मुझे खोज नहीं पाएगा। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन, धरती के भीतर-भीतर, या कभी हवा में, या किसी टर्मिनल में जाकर भागती भीड़ में गुम हो जाओ।”

हम प्लेटफॉर्म के आखिरी छोर पर खड़े होकर कौतुक से उस अंधेरी सुरंग की तरफ झांका करते थे, जहां से मेट्रो आने वाली होती। वह मेरे कंधों पर अपनी ठोडी टिका लेती। मेट्रो के आने से पहले पटरियों में एक अजीब सी सीटियां बजनी शुरू हो जाती थीं। जिधर से मेट्रो आने वाली होती उधर की अंधेरी सुरंग से हवा बहने लगती। उसकी स्कर्ट हवा में लहराने लगती। अंधेरे में डूबी पटरियां चमक उठतीं और अचानक मेट्रो की झलक दिखती। वह पीछे नहीं हटती थी। मेरे मन में अजीब सा डर पैदा होने लगता था। मैं उसे पीछे भी नहीं खींच पाता था। लगता था कि कहीं वह मेरा हाथ झटक कर आगे न बढ़ जाए। हमारे सामने रोशनी लपलपाने लगती। भक-भक चेहरे, चलते-बैठते-खड़े होते लोग दिखते और गायब होते जाते। कुछ पलों में रेंगती हुई मेट्रो रुक जाती। दरवाजे खुलने से पहले कुछ सेकेंड का ठहराव… ऐसा लगता जैसे कुछ पलों के लिए समय ठहर गया है…तभी एक झटके से उसके दरवाजे खुलते।

“तुम्हें पता है कि मैंने अपना नाम कावेरी क्यों रखा?”

“तुमने अपना नाम खुद रखा?”

“हां, नाम पसंद नहीं था तो बदल दिया… जिंदगी पसंद नहीं हो तो उसे भी बदल सकते हैं?”

बहुत से इलाकों में हम शहर के उपर-उपर से गुजर रहे होते। शाम को सूरज की तिरछी चमकीली किरणें जब मेट्रो की खिड़कियों के शीशे से टकराती थीं तो आंखें चौंधियाने लगतीं। शहर, सूरज और दौड़ती मेट्रो के बीच एक धूप-छांव का खेल शुरू हो जाता था।

“तुम्हारा नाम समर क्यों है?”

“यही नाम हर जगह है। मेरे आइडेंटिटी कार्ड पर, मेरे सर्टीफिकेट्स पर…”

“क्या जरूरत है आइडेंटिटी कार्ड्स और सर्टीफिकेट की? आइडेंटिटी कोई और कैसे डिसाइड कर सकता है?”

“अच्छा तो मेरा नाम क्या होना चाहिए?”

“तुम्हारा नाम? …तुम्हारा नाम शायान होना चाहिए।”

“शायान… ये तो उर्दू का शब्द है? इसका मतलब क्या है?”

“ये पर्शियन वर्ड है, यानी काबिल, योग्य, डिजर्विंग…”

“चल… तेरा भी ऐसा ही ऊटपटांग नाम रखूंगा…”

“अच्छा रहेगा, बदले नामों से इस एक जिंदगी को एक बार से ज्यादा जी सकेंगे।”

हम इस कदर भटकते थे कि न दिन का पता चलता था न रात का। रात होते ही मेट्रो के बाहर रोशनी का एक विशाल समंदर बहने लगता था। हम दोनों ठंडे शीशे से अपना चेहरा टिका लेते। शीशे के भीतर एक-दूसरे से आंखें टकराती तो मुस्कुरा देते। शीशे में हमारे अधूरे बिंब हवा में तैरते नजर आते- साइनबोर्ड, इमारतों, मल्टीप्लेक्स, चौड़ी सड़कों और पतली गलियों से होते हुए। अचानक किसी स्टेशन के करीब पहुंचते-पहुंचते बिल्कुल दूसरी दिशा में भागती मेट्रो आ जाती। हमारे प्रतिबिंब और रोशनी एक दूसरे में घुल-मिल जाते थे।

“तुमने कुछ देखा?”

“नहीं तो…”

“बिल्कुल अभी-अभी जो मेट्रो गई है, उसमें मैंने हम दोनों को देखा।”

“हम दोनों को? पागल, हमारी परछाईं होगी…”

“हां, मगर वहां पर हम आजाद थे। अभी हम कैद हैं। वहां तुम तुम नहीं थे, मैं कोई मैं न थी। हम उतने ही हल्के थे जितनी कि भागती हुई रोशनी…”

***

मेरी किताबों पर धूल जमती जा रही थी। अपने रूम में खाली कागज पर मैं कावेरी के स्केच बनाने की कोशिश करता था। हालांकि मैं कभी उसका चेहरा नहीं बना पाता था। काली पेंसिल से सिर्फ उसके घुंघराले बाल, हवा में उड़ती स्कर्ट या उसके शरीर की आकृति ही उभर पाती थी। हर सुबह मैं बेचैनी से कावेरी के फोन का इंतज़ार करता था। हर रोज भीड़ के बीच किसी एक कोने में धूप के टुकड़े की तरह वह मेरा इंतजार करती नजर आ जाती थी। कावेरी को कवितायें सुनना बहुत पसंद था। मैं अक्सर अपनी किसी किताब से उसे कुछ पढ़कर सुनाता था। वह मुझे कभी डायरी तो कभी अपनी लिखी कवितायें सुनाती थी।

वह उस रात की आखिरी मेट्रो थी, जिससे हम लौटे थे। गिनती के लोग उतरे और तेजी से लपकते हुए आँखों से ओझल होते गए। हम आठ लेन वाले हाइवे पर बने उस लंबे पैदल पुल को पार कर रहे थे। पुल के बीचो-बीच आकर उसने मेरे कंधे को ठोका। मैं पलटा। वह बोली नहीं, उसने सामने की तरफ इशारा किया। हमारे सामने रोशनी का एक दरिया बह रहा था। एक तरफ लाल बुलबुले बहे जा रहे थो दूसरी तरफ चमकीले पीले-सफेद। हमने रेलिंग पकड़कर नीचे झांका। रोशनी के ये बुलबुले हमारे कदमों के नीचे से होते हुए बहे जा रहे थे।

“देखो समर…” वह रेलिंग पर झुकी-झुकी बुदबुदाई। उसका इस तरह झुकना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे अनजाना डर सा लगने लगा। मैं चाहता था कि वह वहां से हट जाए।

“नीचे शोर… इधर सन्नाटा। एक वक्त, एक ही दुनिया में हम अलग-अलग सतह पर जीते हैं।”

वह रेलिंग से हटकर पुल के बीचो-बीच खड़ी हो गई।

उसने कहा, “मुझे हमेशा से यकीन था कि कोई न कोई जरूर मिलेगा जो मेरी सतह पर जी रहा होगा। याद है मैंने तुमसे पिछले जन्म वाली बात कही थी?”

वह एक-एक कदम चलते हुए मेरे करीब आती जा रही थी। “मैं तुम्हें खोजती थी। पता नहीं था कि तुम्हें ही खोज रही हूँ… पर किसी को तो खोजती थी, कौन है ये समझ नहीं पाती थी।”

“शायद मैं अपनी स्मृतियों से भी पहले तुमसे मिली थी। इसलिए तुम याद नहीं रह गए… मगर कोई गहरा एहसास आत्मा में आज भी बसा हुआ है कि मैं इस शख्स को जानती हूँ।”

वह मेरे बिल्कुल करीब आ गई। उसकी आंखों में रात उतर आई थी।

“नानी कहती थीं कि जो पिछले जन्म में साथ होते हैं उनके दिल भी साथ धड़कते हैं। मुझे पक्का यकीन है कि हम दोनों के दिल भी एक साथ धड़कते हैं…”

मैं कोई जवाब देता उससे पहले उसने मेरा हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख लिया और अपनी हथेली मेरी धड़कनों पर टिका दी। रात के 12 बज चुके थे और मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूँ। मेट्रो की आवाजाही बंद हो चुकी थी और पटरियां सूनी पड़ी थीं। मेरे दिल की हर धड़कन के साथ ठीक उसी वक्त मेरी हथेलियों के नीचे भी एक स्पंदन हो रहा था। हां, हमारे दिल एक साथ ही धड़क रहे थे। अनुशासित डाल्फिन मछलियों के जोड़े की तरह हम दोनों की धड़कनें एक साथ, एक लय में सतह पर उछलती थीं और फिर डूब जाती थीं। वह समय का एक छोटा सा हिस्सा था पर मेरे लिए कितना बड़ा था। बिल्कुल वैसे जैसे कभी एक रात का सपना पूरी जिंदगी से भी बड़ा हो जाए।

न जाने क्यों मुझे अब तारीख और दिन याद नहीं। उस रात की कोई और घटना भी याद नहीं है। न उसके पहले की और न उसके बाद की। यह एक सपने की तरह था। क्या मैंने कोई सपना देखा था?

***

अगस्त की एक शांत दोपहर में कावेरी ने मुझसे कहा, “ये साल बहुत सुंदर है। इस साल के बदलते हुए मौसम भी बहुत सुंदर हैं। ये डरा नहीं रहे मुझे…”

“तुम्हें बदलता मौसम भी डराता है?”

“हां, इसी बदलते मौसम में तो मेरा बर्थडे भी आएगा… मेरा जन्मदिन मुझे डराता है।”  

और उस दोपहर जब हम जा रहे थे तो मेट्रो लगभग खाली हो गई थी। बोगी में इक्का-दुक्का लोग अपने में ही खोए बैठे थे। उसने इत्मिनान से अपनी डायरी खोली और चुपचाप कुछ लिखने लगी।

“क्या लिख रही हो?” मैंने पूछा।

“अलग सा…” उसने कहा, “सुनोगे?” उसने पढ़ना शुरू किया।

“अतीत एक कैंसर है। हमारे शरीर में ही फैलता रहता है। उससे छुटकारा नहीं है। खुद को कैसे काटकर फेंकोगे। काश अतीत चॉक से लिखी एक इबारत होता जिसे हम कभी भी डस्टर से मिटा सकते।”

“जिंदगी में बहुत सी कड़वाहटें भी हैं…” फीकी हंसी के साथ उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा। वह थोड़ी उदास हो गई, “कब मैं कभी मारीना त्स्वेतायेवा जैसा लिख पाऊंगी? …पत्ते पर फिसलती पानी की बूंद जैसा।”

मैंने खिड़की के बाहर झांका। हमारी मेट्रो अब एक अंधेरी सुरंग में उतर रही थी।

***

उस रात को मैं कभी नहीं भूल सकता।

“चलो नीचे घूमकर आते हैं!” उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा था।

नौ बज रहे थे। वह उस रूट का आखिरी स्टेशन था। मेट्रो लगभग खाली हो चुकी थी। आगे मेट्रो लाइन बन रही थी। हम नीचे उतरे। जगह-जगह सड़क खुदी हुई थी। आसपास काफी अंधेरा भी था। आसमान की तरफ सिर उठाए हुए आधे बने पिलर्स, कैटरपिलर्स की तरह रेंगती नीले रंग की छोटी-छोटी क्रेनों और रूट डाइवर्जन के लिए लगे नीले-हरे रंग से पुते बोर्ड के बीच से हम आगे बढ़ते रहे।

आगे एक बहुत बड़ा मेट्रो स्टेशन बन रहा था। हम धीरे-धीरे उस तरफ बढ रहे थे। कुछ देर में हम एक ऐसी जगह पहुंच गए जहां हर तरफ लोहे के सरिये का जाल बिछा था। हमारे चारों तरफ इतने सरिये थे मानो उनकी बारिश हो रही हो। ऊपर लोहे के पटके जाने, किसी भारी चीज के घिसटने और मशीन से काटे जाने की आवाजें आ रही थीं। एक बहुत बड़ी क्रेन हमारे सिर के ठीक ऊपर धीमी गति से घूम रही थी। उसमें पीली बत्तियां जल रही थीं। ऊपर काफी रोशनी थी और हरे-लाल हैलमेट में फ्लोरेसेंट ग्रीन और आरेंज कलर की जैकेट पहने वहां मौजूद लोगों के बातें करने और चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। दूर एक छोर पर रह-रहकर वेल्डिंग की तेज चमकीली रोशनी कौंध रही थी।

हमारे आसपास बहुत हल्का उजाला था। मैं कावेरी के बहुत करीब था। उसकी आंखों में रह-रहकर एक सुनहरी रोशनी का जाल उभरता था और गायब हो जाता। थोड़ी दूर पर रुक-रुककर पीली चिंगारियां बरस रही थी। उसका चेहरा भी उन चिंगारियों की कंकपाती मुलायम पीली रोशनी में उभरता और दब जाता था।

“17 सितंबर… मेरा बर्थडे है।” उसने मुझे याद दिलाया।

“मैंने तुम्हारे लिए कुछ खरीदा था।” मैंने अपने बैग से उसके लिए खरीदा हुआ गिफ्ट निकाला। यह एक गुड़िया थी जिसे मैंने दो दिन पहले एक हैंडीक्राफ्ट मेले से यह सोचकर खरीदा था कि उसे लकड़ी के खिलौने पसंद हैं। एक लकड़ी के गोल खोखले बेलन पर चित्रकारी करके रंग-बिरंगी बनाई गई थी “इसे खोलो…” मैंने कहा। पीली रोशनी के भभके में उसने गुड़िया को उलट-पुलटकर देखा, फिर उसे नीचे से खोला। उसके भीतर एक और छोटी गुड़िया निकली।

“यह ओरिजनली एक रशियन गुड़िया है। इसे मात्र्योश्का कहते हैं।” मैंने उसे बताया। “यह बिल्कुल तुम्हारी तरह है…” मैंने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा। “सुनो, तुम्हारा नाम मात्र्योश्का नहीं होना चाहिए?”

“मात्र्योश्का…” मैंने दोबारा से इस शब्द को बोला, “मगर कितना मुश्किल नाम है।”

कावेरी ने चुपचाप गुड़िया के भीतर से गुड़िया निकालनी शुरू कर दी। इस तरह छोटी-बड़ी पांच गुड़ियां एक के भीतर एक समाई हुई थीं।

“पता है… मुझे क्या लगता है?” कावेरी अचानक बोली, “मुझे हमेशा इसे देखकर ऐसा लगता है कि सबसे भीतर छोटी वाली गुड़िया ही असली गुड़िया है। बाकी उसे ढक रहे हैं। उसका दम घुट रहा है। जब मैं सारे खोल हटाती हूँ तो भीतर वाली गुड़िया आजाद हो जाती है और सांस ले सकती है।”

“पर ये अच्छा गिफ्ट है…” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं इसे हमेशा अपने पास रखूंगी और हां, मेरी छोटी वाली गुड़िया हमेशा आज़ाद रहेगी।”

***

कब मौसम ने करवट ली हमें पता ही नहीं चला। अब आसमान अक्सर बादलों से ढका रहता था। हमारा बस चलता तो हम मेट्रो को ही अपना घर बना लेते। बारिश की बूंदें जब दौड़ती-भागती मेट्रो के शीशे से टकराकर छितरा जाती तो कावेरी के चेहरे पर रौनक आ जाती। कभी किसी स्टेशन पर उतरकर उसकी चौड़ी बालकनी में खड़े होकर हम आसमान से गिरती बूंदों का मजा लेते और दूर बादलों के बीच बन रहे आधे-अधूरे इंद्रधनुष को कौतुक से देखते।

“गुज़र गईं कितनी बारिशें
धूप, पतझड़ और ठिठुरन
सूरज, तारे और रात
और फिर किसी रोज
एक सर्द, गीली और उदास शाम
खिड़की के बाहर शाखों पर अटके
पत्तों को हिलते देखती हूँ
मैं बेवजह”

“बेटा, तुम दोनों को इश्क हो गया है… तगड़ा वाला!” आयुषी ने एक दिन फोन पर हँसते हुए मुझसे कहा।

कभी-कभार हम थोड़ी देर के लिए ठहर भी जाते थे। अक्सर किसी सूनसान से प्लेटफॉर्म पर। मैं अपनी स्केचबुक खोल लेता। वह मेरे कंधे पर ठोडी टिकाए उन सफेद कागजों पर बिना चेहरे की लड़की, बिजली के पोल, डूबते सूरज और उड़ती चिड़ियों के तमाम बने-अधबने स्केच टकटकी लगाए देखती रहती। हम सन्नाटे में डूबे मेट्रो स्टेशन में फड़फड़ाते कबूतरों को देखते, जो बारिश से बचने के लिए वहां अपना ठिकाना बना लेते थे। वे ऊपर बने तारों और लोहे के एंगल पर अपने भारी पंखों से सन्नाटे को तोड़ते इधर से उधर उड़ते रहते थे। ऐसी ही एक गुमसुम सी दोपहर, खाली-खाली से उस प्लेटफॉर्म की बेंच पर उसने एक दिन मुझे कहा, “याद है जब मैं पहली बार तुम्हारे कमरे पर आई थी तो मैंने अपनी डायरी में कुछ लिखा था… सुनाती हूँ।” कावेरी ने उस दोपहर मेरे कमरे में लिखी अपनी छोटी सी कविता सुनाई।  

“सोचती हूँ
इस सिंदूरी शाम को चुरा लूं
अपने पास सहेज कर रखूँ
इस शाम में
तुम्हारे होने की मिलावट जो है”

***

हमारी मुलाकातों को पंख लग गए थे और दिन थे कि परिंदों की तरह उड़े जा रहे थे। हर चीज एक-दूसरे में घुल-मिल रही थी। हम मौसम में घुल रहे थे और मौसम के रंग हमारे भीतर उतर रहे थे। हम दोनों भी एक-दूसरे घुलते जा रहे थे, जैसे पानी में दो अलग-अलग रंग फैलते हुए आपस में मिक्स होने लगते हैं। इसके लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं थी। हमारे लिए परिचय का मतलब ही अलग था। हमारे लिए परिचित होना था – एक-दूसरे की सांसों, धड़कनों को महसूस करना, पलकों को उठते-गिरते देखना और बिना कुछ कहे साथ-साथ रहने की गरमाहट को महसूस करना।  

छितराए हरे पेड़ों से कुछ ऊपर हमारी मेट्रो भाग रही थी। दूर कुतुबमीनार दिख रहा था। वह मुझे अपनी डायरी पढ़कर सुना रही थी। वह हिलती मेट्रो में ध्यान से डायरी का एक-एक शब्द पढ़ती थी। मुझे याद आया उमस वाले दिनों में अक्सर उसकी नाक पर पसीने की बूंदे इकट्ठी हो जाती थीं। मैं उसे देखता ही रह जाता था। ऐसे में वह कभी-कभी मुस्कुराती तो और भी ज्यादा मासूम लगती थी।

“हमें खुद को भूलना सिखाया गया है। मुझे बताया जाता है कि तुम कावेरी हो, तुम्हें यकीन दिलाया जाता है कि तुम समर हो… लेकिन किसी एक अकेली दोपहर या शांत रात में हमें महसूस होता है कि अरे हम तो कुछ और हैं या थे। एक दिन अचानक तुम जब बाहर निकलते हो तो वही रास्ते नए से लगने लगते हैं। हवा कुछ अलग तरीके से तुम्हारे चेहरे से टकराती है। तुम्हें लगता है कि तुम किसी जानी पहचानी नहीं बल्कि अनजान सी मंजिल की तरफ बढ़ रहे हो।”

“एक यह भी…” उसने पेज पलटते हुए सिर्फ एक लाइन पढ़ी।

“सुनो! मेरे सपनों से होकर वह ट्रेन गुजरती है… वह मेरे मन की अंधेरी सुरंग में दौड़ती है…”

“कल मैं अपना बर्थ-डे बिल्कुल अलग तरीके से मनाऊंगी।“ कावेरी ने अपनी डायरी बंद करते हुए कहा, “इस साल तुम हो मेरे साथ। हां, कल हम पूरे दिन साथ रहेंगे। मैं, तुम और आयुषी… पूरे दिन मस्ती करेंगे। बस एक बात याद रखना, पिछले कुछ सालों से मेरे जन्मदिन पर अक्सर कुछ गड़बड़ हो जाती है। कुछ हो जाए तो ज्यादा टेंशन नहीं लेना। ओके?”

“पागल… गड़बड़ क्या होगी?”

“पता नहीं…” उसने कुछ उदासी से कहा।

“मैंने अपने जन्मदिन के लिए एक कविता लिखी है।” उसने मुझे चौतरफा मोड़ा हुआ कागज दिया, जिसे बड़ी सफाई से ग्लू की मदद से चिपका दिया गया था, “तुम कल पढ़कर सुनाना मुझे…”

“ये तुम्हारे लिए…” मैंने उसकी तरफ अपनी स्केचबुक बढ़ाई।

“यह क्या है?”

“जबसे हम मिले हैं, मैं तुम्हारे आधे-अधूरे स्केच बनाने की कोशिश करता रहा। अब यह स्केचबुक भर गई है।“

हम टर्मिनल पर थे। यहां से हमें अलग होना था। आज स्टेशन पर बहुत ज्यादा भीड़ थी। लोग थे कि मधुमक्खियों की तरह उमड़ते ही जा रहे थे। वह लाइन में लगी थी और मैं उसके ठीक बगल में खड़ा था। उसने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों से थाम रखा था।

प्लेटफार्म पर हलचल सी हुई। मेट्रो आ धमकी थी। उसका हाथ पसीज रहा था। लोग भीतर जाने के लिए दरवाजों पर भीड़ छंटने का इंतज़ार कर रहे थे। “मिलते हैं…” मैं बुदबुदाया और धीरे से अपना हाथ उसके दोनों हाथों से छुड़ा लिया। वह भीतर चली गई। बीप-बीप की आवाज के साथ दरवाजे एक साथ बंद हो गए। ट्रेन रेंगने लगी। वह अचानक दरवाजे के पास आई। जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि जैसे मुझसे कुछ कहना चाहती है। मैं थोड़ा तेजी से रेंगती ट्रेन की दिशा में लपका। शायद वह कोई इशारा करे। उसकी आंखें देखकर मुझे न जाने क्यों उसके साथ पहली मुलाकात याद आ गई। मुझे लगा कि वह कुछ कहना चाहती है मगर वह अंधेरी सुरंग में मेरी आंखों से ओझल हो गई। जाने कब दूसरी मेट्रो भी पहुंच गई। और अब मेरे चारो तरफ लोग ही लोग थे।

मैं पहले दिन भी उससे हजारों लोगों की ऐसी ही भीड़ में मिला था। हर तरफ इतने लोग, इतने चेहरे, इतनी आवाजें, इतने भाव, इतनी आंखें… एक विशाल समंदर था इनका जिसमें मैं तैर रहा था। वहां सब कुछ गतिशील था। वहां हर पल चेहरे, भाव, आवाजें और आँखें बदल रहे थे। मगर दरवाजे से झांकती वे आँखें मेरे मन में कहीं टंक गई थीं। वे समय के इस बहाव में स्थिर सी हो गई थीं।

रात को जब मैं कमरे पर लौटा तो मन बहुत उदास था। कुछ बेचैनी सी भी थी। यह बिल्कुल वैसा था जब मैं कावेरी से पहली बार मिला था। सिर में तेज दर्द हो रहा था। मैंने खाना नहीं खाया। मोबाइल साइलेंट पर लगाया और लाइट ऑफ करके लेट गया।

***

खिड़की से चेहरे पर पड़ती सीधी धूप ने मुझे जगा दिया। नौ बज रहे थे। कावेरी ने कहा था कि वह आयुषी के साथ सुबह 11 बजे तक मेरे रूम पर आ जाएगी। मैंने जब फोन देखा तो हड़बड़ा गया। आयुषी की 19 मिस्ड कॉल पड़ी थीं। मैंने जल्दी से उसे कॉल बैक किया।

समर… कहां हो तुम? जल्दी आओ…” आयुषी रो रही थी।  

मैं आयुषी के रूम में था। खिड़की पर लकड़ी के सारे खिलौने उसी तरह से सजे हुए थे मगर सभी बहुत उदास से लग रहे थे। मेरी स्केचबुक के अलग-अलग पन्ने बेड पर बिखरे हुए थे। कहीं बारिश की आड़ी-तिरछी लकीरों में गुम होती कावेरी थी, कहीं सिर्फ उसकी बेचैन हथेलियां और कहीं उसके घुमावदार बालों की लटों के ऊपर उड़ते परिंदे। मारीना त्स्वेतायेवा की किताब सिरहाने पड़ी थी, मगर उस पर लिखा मारीना का नाम बॉल पेन से काट दिया गया था और उसके बगल में लिखा था कावेरी।

“कावेरी कल रात से नहीं आई… उसका फोन स्विच्ड ऑफ है। मैं तुम्हें रात से लगातार फोन करती रही। सारी रात मैं जगी रही। सुबह भागी-भागी उसके कोचिंग गई ताकि उसकी फैमिली की डिटेल्स ले सकूं…”

“फिर?” मेरा हृदय किसी अज्ञात आशंका से धड़कने लगा।

“सब गलत था… वहां कावेरी नाम की किसी लड़की ने एडमिशन नहीं लिया था। उसका नाम कावेरी नहीं था। उसने हमें जो कुछ भी बताया वह सब एक कहानी थी।”

“ये देखो…” उसने मेरे सामने दवाओं की स्ट्रिप्स गिरायी, “ये दवायें लेती थी वो… ये दवायें शिजोफ्रेनिया के पेशेंट को दी जाती है।”

“कावेरी की कोई आइडी? फोन नंबर कैसे इश्यू हुआ?”

“उसकी आइडी तो चोरी हो गई थी…” आयुषी ने कहा, “मैंने अपनी आइडी पर उसे नंबर दिलवाया था।”

समर, मैं कई दिनों से कावेरी के बारे में तुमसे बात करना चाहती थी… मैं उसके साथ लगातार रहती थी न। वह पिछले कुछ दिनों से अजीब सी बातें करती थी। रात को सोते-सोते डरकर उठ जाती थी। उसके साथ कुछ तो बहुत बुरा हुआ था। वह लगातार अपने अतीत से भाग रही थी। वह अपने बर्थडे के बारे में इन दिनों रोज बातें करती थी। परसों मुझसे बोली – अगर बर्थडे के दिन मुझे कुछ हुआ तो तुम और समर बचा लेना…”

थोड़ा ठहरकर आयुषी ने कहा, “मुझे अभी यह समझ में आया है कि हर साल सितंबर में उस पर शिजोफ्रेनिया का अटैक पड़ता है। शायद अपने अनकांशस में वह डर रही थी। पिछले कुछ दिनों से उसे रास्ते भूलने लगे थे…”

मैंने बिस्तर पर पड़ी उसकी काले रंग की डायरी उठा ली और घबराहट और बेचैनी से पन्ने पलटता हुआ उसकी लिखावट को देखने लगा।  

18 जुलाई
उस दिन भी मैं घबरा गई थी। समर की गलती नहीं है। जब भी कोई मेरे पास आता है तो लगता है अंधेरे साये मुझे चारो तरफ से घेर रहे हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मुझे याद आता है वह गरमाहट से भरा हाथ जिसे थामकर मैं दुनिया की सबसे सुरक्षित लड़की बन जाती थी। वह हाथ अचानक छिपकली बनकर मेरे ऊपर रेंगने लगता है। एक गोला सा मेरे पेट से ऊपर की तरफ उठने लगता है। कानों के ऊपर कुछ दबाव सा पड़ने लगता है। ऐसा लगता है कि मैं सांस नहीं ले पा रही हूँ। मैं सांस नहीं ले पा रही। मैं सांस नहीं ले पा रही। मैं मर रही हूँ। पापा, मैं जिंदा हूँ और मर रही हूँ।

9 अगस्त
मैं जिन वजहों से तुम पर अभिमान करती थी, अब वही मुझे भीतर से छील गया है। वो गर्म डरावनी सांसें, वो छिपकली जैसे हाथ, वो गुरूर – जिसने मुझे कुचल दिया। लगा कि मैं संसार में लाई ही इसलिए गई कि तुम मेरी यातनाएं तय कर सको, क्रूर खेल में मुझे खिलौना बना सको, एक शिकारी की तरह इत्मिनान से मुझे कमजोर टांगों के सहारे भागते हुए देख सको।

23 अगस्त
एक लिसलिसे अंधेरे और खून को मैंने अपनी कांपती उंगलियों से छुआ है… मैं कैसे चीखती जब तुमने मेरी आवाज ही छीन ली।

12 सितंबर
इस साल का ये मौसम अजीब है
अजीब हैं हवाएं
जब ये पलटती हैं किताब के पन्ने
भीतर दबे सूखे पत्ते थरथराते हैं
सोचती हूं इस बार उड़ जाने दूं
बरसों से सहेजे उन पत्तों को
बिखरने दूं उन्हें इन मौसमी हवाओं के संग
यमुना किनारे की कुचली घास और बलुई मिट्टी में

“आयुषी, मैं तुमसे मिलता हूँ।” मैंने डायरी बिस्तर पर फेंकी तभी अचानक मेरी निगाह डायरी के कवर से निकलकर गिरी एक तस्वीर पर पड़ी। यह पोस्टकार्ड साइज का फोटोग्राफ था, जिसके रंग धुंधले पड़ गये थे। यह कावेरी के बचपन की तस्वीर थी। वह शायद आठ-नौ बरस की थी और किसी की गोद में बैठी थी। मगर जिस शख्स की गोद में बैठी थी उसका चेहरा पेन से बुरी तरह बिगाड़ दिया गया था। और एक-एक करके मेरे भीतर कावेरी के सभी अधूरे स्केच जुड़ते चले गए। ये थी कावेरी… वो आठ-नौ बरस की बच्ची।

“कहां जा रहे हो?” आयुषी ने कमजोर और थोड़ी डरी सी आवाज में पुछा।

“मैं तुम्हें फोन करूंगा…” मैं बाहर निकलते-निकलते बोला।

***

मैं यमुना के किनारे खड़ा था। उसी पुराने से पीपल का पेड़ के पास… जिसके ऊपर ढेर सारी चिड़ियों का बसेरा था। दूर-दूर तक फूलों के खेत फैले हुए थे। दोपहर ढल रही थी। यथार्थ जब गहरे दुख और निराशा के क्षणों में पहली बार हमारे सामने प्रकट होता है, तब हमें पता लगता है कि हम अब तक जिस दुनिया में जी रहे थे, उसके बहुत सारे रंग हमारी कल्पनाओं के थे। तब ईश्वर हमें महज पत्थर की मूर्ति नजर आते हैं। बस किसी अनाड़ी कारीगर के हाथों से बना अनगढ़ शिल्प… और वे आँखें और होठ महज पुते हुए रंग नजर आते हैं। तब लोग बहुत पराये दिखते हैं। मकान बहुत ऊंचे, सड़कें बहुत लंबी, बत्तियां बहुत दूर, प्रकृति बहुत कठोर लगती है। दुख हमारी नंगी पीठ पर चाबुक की तरह बरसता है।

मैं यहां आने से पहले हर उस स्टेशन से गुजरा जहां-जहां से होकर कावेरी गुजरती थी। दरवाजे के शीशे से सिर टिकाये स्टेशन-स्टेशन ताकता रहा। लगा कहीं वह अकेले बैठी दिखे जाएगी… अपने माथे पर उभर आई पसीने की बूंदों के साथ। मैं दौड़कर खुले दरवाजे से नीचे उतर जाऊंगा। वैसे ही उसकी ठंडी होती बांह थाम लूँगा, जैसे पहली मुलाकात में थामी थी। उसकी नम हथेलियों को अपने हाथों में दबाकर गर्म करूंगा। मगर हर भीड़ भरे स्टेशन पर एक सन्नाटा सा था… जो सिर्फ मेरे कानों में गूंज रहा था। हर खिड़की में अजनबी चेहरे बेजान पोस्टरों की तरह टंगे हुए थे। मेट्रो के भीतर मेरे आसपास हंसते-बोलते लोग ऐसे लग रहे थे जैसे कि कोई फिल्म चल रही हो। वे किसी और सतह पर थे। मुझे लगा कि अगर मैं जोर से चीखूंगा या रो पड़ूंगा तो भी वे मेरी आवाज नहीं सुनेंगे। कांपती हुई कावेरी की तरह मुझे इस भीड़ में कोई नहीं देखेगा… कोई नहीं पहचानेगा।

मैं चुपचाप उस टूटे हुए चबूतरे पर बैठ गया, अपने सीने पर हथेली को रखा और खुद की धड़कनों को सुनता रहा। क्या ठीक इसी वक्त उसका भी दिल धड़क रहा होगा कहीं… कहां होगी वह? मैंने जेब से कावेरी का दिया कागज निकाला और उसे खोलकर पढ़ना शुरू किया।

एक कविता मेरे जन्मदिन के लिए

सोचती हूँ आज
उतार दूं अपना बनावटी चेहरा
डाल दूं नाम एक खाली दराज में
उदासी किसी अलगनी पे लटका दूं
खोलूं वो पुरानी संदूकची
तहें ठीक करूं छूट गई हँसी की
सलवटें संवारूं भूली-बिसरी उदास शामों की
और सामने आइने के देखूं खोए हुए खुद को

यमुना किनारे तेज हवा चल रही थी। मेरे हाथ में वो कागज हवा से बुरी तरफ फड़फड़ाता रहा और अचानक छूटकर पल भर को पेड़ से चिपक गया और फिर उड़कर जाने कहां गुम हो गया। मैं उठकर पीपल के पेड़ के दूसरी तरफ बढ़ा। अचानक मेरी निगाह बालू में दबी किसी चटख रंग की चीज पर पड़ी। मैंने झुककर उसे निकाला।

यह मात्र्योश्का थी। रशियन गुड़िया जो मैंने कावेरी को गिफ्ट की थी।

मैंने गुड़िया के ऊपर लगी मिट्टी और बालू को हटाया। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि कोई मेरे पीछे खड़ा है। मैंने पलटकर देखा तो एक आठ-नौ बरस की बच्ची खड़ी थी। उसके उलझे बाल हवा में उड़ रहे हैं। वह मेरे हाथ में दबी गुड़िया को गौर से देख रही थी।

हम दोनों कुछ पल तक हवा के शोर और परिंदों की चहचहाहट के बीच एक-दूसरे को चुपचाप खड़े देखते रहे।

“तुम्हें यह चाहिए?” मैंने पूछा।

उसने हामी में सिर हिलाया।

“तुम्हारा नाम क्या है?”

“मं-जू।”

“कहां रहती हो?”

उसने हाथ से इशारा किया। दूर फूलों के खेत के बीच एक छोटी सी झोपड़ी बनी थी।

“तुम्हें पता है इस गुड़िया का क्या नाम है?”

उसने इनकार में सिर हिलाया।

“इसका नाम मात्र्योश्का है। ये देखो इसके भीतर एक गुड़िया है… और गुड़िया के भीतर एक और गुड़िया है… और इसके भीतर एक और…”

वह हंस दी और मेरे थोड़ा करीब आ गई।

तुम्हा-रा ना-म? उसने अटकते हुए पूछा।

“मैं?” पल भर को मैं ठहरा।

हमारे ठीक ऊपर देसी मैना का झुंड चीखते हुए उड़ रहा था।

“…मेरा नाम शायान है।” मैंने एक गहरी सांस लेकर कहा, “कहानियां सुनाता हूँ… अगली बार आऊंगा तो तुम्हें एक लड़की की कहानी सुनाऊंगा…”

“कि-स ल-ड़की की?”

“एक ऐसी लड़की की जो जीना चाहती थी… हर हाल में…”

मैंने उसे गुड़िया थमा दी। उसने खुश होकर गुड़िया थाम ली और अपने घर की तरफ दौड़ती हुई चली गई। मैं चुपचाप खड़ा उसे देखता रहा। जब तक कि वह भागते हुए फूलों के खेत में गुम नहीं हो गई।

यहां से शायान और मात्र्योश्का की कहानी शुरू होती है।