मेरुदण्ड

पल्लवी विनोद की कविता ‘मेरुदण्ड’ | ‘Merudand’, a poem by Pallavi Vinod

बहुत बदल गयी हैं लड़कियाँ आजकल
वो कहते हैं कि बिगड़ गयी हैं लड़कियाँ आजकल
जो कभी धैर्य, शील की परिभाषा थी,
मौन ही जिसकी भाषा थी,
वो अब हर बात का जवाब देने लगी है
नहीं रोती बन्द कमरों में किवाड़ लगाकर,
हर उचित-अनुचित कृत्य का हिसाब लेने लगी है।

क्योंकि उसने देखा है माँ को,
सुबह से रात तक
ओखली से जाँत तक
कभी पीसते, कभी पिसते हुए
दादी की दुर्गंध साफ़ कर
बाबा की धोती पर साबुन घिसते हुए
उसने देखा है तमाचा खाकर भी
हर शादी में बुआ को हँसते हुए
मौसी की सुन्दरता पर लोलुप चाचा को
घटिया तंज़ कसते हुए
उसने देखा है अपनी उलझे बालों वाली माँ को
चाहे अनचाहे सँवरते हुए
अशुद्ध दिनों के दर्द को झेलती
पिता की झूठन कुतरते हुए।

वो जानती है कि शील की मूर्ति बनकर भी
उससे उसके हर पल का हिसाब माँगा जाएगा
उसके हर एक कौर पर अहसान लादा जाएगा
दिन भर तो ख़ाली पड़ी रहती हो!
बैठे-बैठे खाती रहती हो!
जाने क्या चमकाती रहती हो!
किसके लिए ख़ुद को सजाती रहती हो!
और न जाने कितनी बातें, कितनी सौगातें
जो उसने अपनी माँ, बुआ, चाची, मामी को सहेजते देखा है
जाने कितनी इच्छाओं, जाने कितनी उम्मीदों
को झूठे बर्तनों के साथ धोते देखा है।

उसने देखा है कपड़ों से ढके बदन पर भी
जानी-पहचानी नज़रों को मचलते हुए
महसूस किया है आशीष देते हाथ को
अपनी पीठ पर फिसलते हुए
उसने देखी है पिता की शर्ट, चाचा की पैंट
चमकाती औरतों की एक दुनिया को
उपले पाथती, आँगन लीपती
पल-पल घिसती, दर्द से झुकती गुनिया को।

उसने महसूस की है उन सूनी आखों की तरावट
जब महीनों बुआ को बुलाने कोई न आया था
‘बंजर धरती का काम नहीं’ सन्देशा भिजवाया था
धरती बंजर थी या बीज बेकार
यह जानने की एक कोशिश न हुई
वो मनहूस बाँझन बन गयी, जो रही अनछुई
पर अब उसकी अजन्मी बहनों की चीख़
सवाल करती है।
अपने सवाल का जवाब माँग कर
आज वो बवाल करती है।
लड़ाका है, पटाखा है, दमदार ठहाका है
ये आजकल की लड़की
सदियों के द्वंद्व का जयघोष करती पताका है।
वो ख़ुद को जान चुकी है
अहमियत सम्मान की पहचान चुकी है
वर्जित कलपुर्ज़ों को उसने अपनी उंगलियों से खोला है
सुप्त इंद्रियाँ जाग गयी हैं
‘नहीं अब और नहीं’ बस यही तो बोला है
और तुम अभी से घबरा गए!
प्रवचनों में बेटी को हीरा बता गए!
लेकिन अब वो कोई खुली तिजोरी और सफ़ेद कपड़ा नहीं है
वो ग़ुरूर है अपनी अम्मा का
जब चाहे सुना दो वो बकवास लफ़ड़ा नहीं है।
प्लास्टिक की परत चढ़ा ली है उसने
तुम्हारा कीचड़ उसके सम्मान की धार से
ख़ुद ब ख़ुद बह जाएगा।

उन्मुक्त है, स्वच्छंद है, ख़ुद की सोचती है, उद्दंड है
पर आज भी हो तुम उसी पर आश्रित
हर घर की वो मेरुदण्ड है!

यह भी पढ़ें: पल्लवी विनोद की कविता ‘पुरुष अभिशप्त है’

Recommended Book: