बस आ जाती है;

मत पूछो!
कैसे?
कब?
चंद उलझनों के बीच,
लड़खड़ाते;
नींद छू लेती है
पलकों और आँसुओं
के ठीक किनारे
के दायरों को;
और वो जो उठती गिरती
परछाईं होती है
अँधेरे में कुछ धुंधले
किस्सों और कहानियों की
जो रोज दुहराते हैं हम
यादों की तरह,
वहीं कहीं आसपास ही
भटकती रहती है,
नींद;
कभी बेसुध होकर
बरस पड़ती है
उन थकी हुई
उपमाओं का स्वागत करने को!
जो ना जाने कितने विषय खोज कर लौटी हों,
फिर से एक नया दिन शुरू करने,
तलाश में,
या यूं कह लें कि,
आकर भी पूरी नहीं आती,
बस बेबस लेटना और
छत को एकटक देखना
रातों को गहराई से निहारना
और कुछ सवाल बुनना
उसे आने पे मजबूर कर देते हों;
कमबख्त बड़ी मेहनत करवाती है
कभी ग्रीष्म, कभी शीत
तरीके ओढ़ने पड़ते हैं
उसकी बाट जोहने में!

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आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

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