‘Paryavasaan’, a poem by Pranjal Rai

जब रोते हुए पैदा हुआ था
पहला बच्चा सृष्टि में
तो पैदा हुई थी सृष्टि में ‘लय’
उस पहली निश्छल और पवित्र रुलाई में
सृष्टि का सबसे मधुर संगीत था।

सृष्टि के उद्दीपन के प्रति
कुछ अर्थपूर्ण कहने के प्रयास में
पहले बच्चे की-
पहली अस्फुट ध्वनि के साथ
जन्मी भाषा,
न सध पाए शब्द के उच्चारण की इस कोशिश में
व्याकरण के उत्स का बीज जगा था पहली बार।

जब पहला बच्चा
उठा बकइयाँ चाल से
और पहली बार लड़खड़ाते हुए
चला दो क़दम
तो पैदा हुआ था सृष्टि में नृत्य,
ढमलाकर गिरने से ठीक पहले की तरंगित शिशु-काया में
सृष्टि की सबसे आकर्षक और शाश्वत मुद्रा थी।

जब पहली बार
उसने धरती के ललाट पर
दूधिया चाक से खींची आड़ी-टेढ़ी रेखाएँ
तो सृष्टि में जन्मी चित्रकला।
उन ग़ैर-सुडौल रेखाओं में
आन्तरिक सत्य पूरी ईमानदारी से हुआ था मूर्त।

पहले बच्चे की
पहली मीठी शरारत के बाद
‘मैं नहीं माखन खायो’ शैली की भाव-भंगिमा से
निकला था ‘अभिनय’।
उस चंचल चितवन पर आ टिकी थी
विश्व भर की सारी मासूमियत।

फिर बड़ा हुआ बच्चा
समझ आती रही,
चेष्टाओं का आकार बढ़ने लगा,
निश्छलता भी उतनी निश्छल न रही।
एक दिन मामूली से झगड़े में
एक हमउम्र किशोर को
उसने एक भद्दी-सी गाली दी
जिसने सुरीले संगीत को शोरीला कर दिया,
व्याकरण के बीज जल गए,
तमाम मुद्राएँ डूब गयीं किसी गहरे सदमे में,
एक जंगल उग गया उसकी वाणी में,
यह विश्व की पहली दुर्घटना थी
जिसमें सृष्टि ने महसूस की
दबे पाँव आने वाले
भविष्य के उन क्रमिक हादसों की आहट,
जो मनुष्य को मनुष्यतर की बजाय
मनुष्येत्तर बनाते चले जाते हैं।

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प्रांजल राय
बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान में अध्ययनरत छात्र | वागर्थ, कथादेश, जनसंदेश-टाइम्स, पाखी, कथाक्रम, परिकथा, अक्षरपर्व, अभिनव इमरोज़ एवं सम्प्रेषण आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित