‘Pranvayu’, a poem by Pallavi Vinod

पुरुषों की दुनिया में आपका स्वागत है!
यहाँ आप माँ हो, बहन हो, बेटी हो,
बहू हो, बीवी हो, भाभी हो, दीदी हो
बस, स्त्री नहीं हो!
क्योंकि स्त्री होते ही आपका अस्तित्व कुलबुलाने लगता है
आपकी आँखों का सूरज टिमटिमाने लगता है
आपको अधिकार और भीख का फ़र्क़ पता चल जाता है
बंदिशों की बेड़ियों में आपका वजूद कसमसाता है।

अरे ज़रूरत क्या है स्त्री होने की!
उनसे जुड़े रिश्तों से इतर सोचने की!
क्या कमी क्या है तुम्हें,
सास बन बहुओं पर हुक्म चलाओ।
ननद बन भाभी की जान खाओ।
पड़ोसन बन मोहल्ले की ख़बर सुनाओ।
मेमसाहब बन मेरे कनिष्ठों की बीवियों पर रौब जमाओ!
माँ हो त्याग की मूर्ति बनो, हर तरह की भूख की आपूर्ति बनो
क्या! करना क्या है स्त्री बनकर?
सजो धजो, बैठी रहो बन-ठनकर।

क्या कहा! दूसरी औरतों के दर्द से परेशान हो?
तुम ना थोड़ी पागल हो, भोली हो, नादान हो।
आओ मेरे पास आओ! देखो क्या लाया हूँ तुम्हारे लिए
और तुम औरत! उन सुनहरे कागजों में लिपटे उपहारों से संतुष्ट हो जाती हो।

पर कभी फ़ुर्सत मिले तो पूछना ख़ुद से, क्या वास्तव में संतुष्ट हो पाती हो तुम!
क्या देर रात खर्राटों के बीच भी ख़ुद के अकेलेपन से नहीं घबराती हो तुम?
क्या नहीं चुभती तुम्हें पायल और बिछिये में जड़े नगीने की चुभन?
क्या भोर की नींद से ख़ुद को जबरन नहीं जगाती हो तुम?
असल में नारी के अंदर किसी भी इच्छा का होना ही फ़िज़ूल बात है।
जन्म लेने का हक़ भी नहीं जिसे, इस दुनिया में भला उसकी क्या बिसात है।
तुम स्त्री हो, मतलब शांत रहो, बहस मत करो, जवाब मत दो
वो क्या करता है! कहाँ जाता है! का हिसाब मत लो
क्योंकि तुम औरत हो, तो तुम्हें फलां फलां काम करने हैं
धनोपार्जन का ज़रिया बनो फिर भी घर के काम तुम्हारे ही जिम्मे हैं।
उसके बाद तुम्हारे साथ जो भी होता है वो तुम्हारा भाग्य है,
अच्छा बुरा जैसा हो जीवन, सुहागन मरना तो हम औरतों का सौभाग्य है।

नाचना ग़लत है, गाना ग़लत है, घूमना ग़लत है
क्योंकि तुम्हारे लिए ये ज़माना ग़लत है।
और तुम्हारी इच्छाएँ! इच्छा जैसा शब्द भी औरतों के लिए अनर्थ है।
ग़लत और सही के पहाड़े रटते-रटते स्त्री,
भूल जाती है कि उसके मन में भी कुछ भावनाओं, कुछ सपनों, कुछ विचारों का जन्म होता है।
दो एकम दो, दो दूनी चार, स्त्री की ज़िन्दगी उसका घर-उसका परिवार।
ये वाक्य आत्मसात कर नारी वो शून्य बन जाती है जिसका अस्तित्व पुरूष के पीछे रहकर ही होता है।

प्रेम तो समर्पण माँगता है, पर सिर्फ़ औरत से
लज्जा आभूषण है, पर सिर्फ़ औरत का
ये घूँघट ये बुर्क़ा हमारी रस्में हैं जो निभानी पड़ती हैं, पर सिर्फ़ औरत को
एक घर से दूसरे घर की लाज बचानी पड़ती है, सिर्फ़ औरत को।
प्रसव के दर्द को घोंटकर, रातों को दिन बना ख़ुद के अंश को तुम्हारा नाम देती औरत,
इच्छा अनिच्छा की परवाह किये बिना तुम्हारी हर हाँ को हाँ, हर ना को ना कहती ये औरत,
समस्त अभिव्यंजनाओं का दमन कर तुम्हारे पौरुष को पोषित करती ये औरत,
तुम्हें सुबह की धूप दे ख़ुद के लिए सीलन चुनती ये औरत,
अब निकल पड़ी है अपने अस्तित्व की तलाश में,
पुरुषों की दुनिया में ख़ुद के लिए जगह खोजने के प्रयास में
स्त्री आगे बढ़ो, देखो दूसरी स्त्री को जो खड़ी है तेरे सम्बल की आस में!
थामो उसकी बाहें, बन जाओ एक दूसरे की ताक़त
भरो प्राणवायु एक दूसरे की साँस में!

यह भी पढ़ें: पल्लवी विनोद की कविता ‘नहीं हो तुम ख़ूबसूरत’

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