हथेलियाँ मिलीं,
हथेलियाँ मिलने लगीं,
शहर हथेलियों में घूमने लगा।
फिर एक दिन उंगलियाँ मिलीं,
और उंगलियाँ भी मिलने लगीं,
अब शहर का वो हिस्सा उंगलियों ने घूमा
जो हथेलियों की सरहद से बाहर था।
अबकी हथेलियाँ और उंगलियाँ दोनों मिलीं,
दोनों रोज़ साथ-साथ मिलने लगे, अब सारी धरती इनमें घूमती है।
फिर बहुत देर से मुठ्ठियाँ मिलीं,
साथ घूमीं, सारी रात गले लगी रहीं
और इनमें घूमता रहा समूचा अकेलापन,
जब होश आया तो देखा- दोनों की आँखों में गढ़ा पानी था पलकों की कोरों पर जमा हुआ,
तब अंगूठों ने मुट्ठियों के कंधे पर सर रखा
एक दूजे को डूब के देखा, आँसू पोछे, सहलाया और थपकियाँ दीं।
मुट्ठियों की इजाज़त से, नाखूनों ने एक दूजे की हथेली को कस के चूमा और फिर दोनों साथ सो गये,
इस तरह से हथेलियों की ये पहली रात थी।
सुबह हुई तो मुठ्ठियाँ खुल चुकी थीं, पर छोटी उंगली, छोटी उंगली पर सो रही थी…

जैसे हम सोते हैं नवजात शिशु की तरह।
(ये दुनिया का सबसे कोमल दृश्य था)

(18 ! 02 ! 2019)

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देवेन्द्र अहिरवार
छतरपुर ज़िले के 'पहरा' गांव से हूँ, 2012 में मध्यप्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा के पहले बैच से पास आउट, 2017 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से डिज़ाइन और डिरेक्शन से स्नातक लिखता हूँ- स्क्रिप्ट, कविताएं, गाने। गाता हूँ, म्यूज़िक बनाता हूँ मंडी हाउस दा बैंड का फाउंडर हूँ डिज़ाइन और डिरेक्ट करता हूँ इतना कुछ करता हूँ कि कुछ भी ठीक से नहीं कर पाता प्रेम के अलावा दोस्त कहते थे कि 70 MM के पर्दे पर तुम्हारा नाम बहुत अच्छा लगेगा, इसी लिए मुम्बई में हूँ और मैं किताब पर अपना नाम लिखा देखना चाहता हूँ, पर कोई पब्लिकेशन इंटरेस्ट नही दिखा रहा है!

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