पृथ्वी की नाक और चिट्ठी

‘Prithvi Ki Naak Aur Chitthi’, a poem by Pratibha Gupta

बिस्तर के कोने पर
चुपचाप पड़ी देह
गर्म हो चली थी,
किन्तु आत्मा अब भी ठण्डी थी।
कानों में फुसफुसाता हुआ कोई
हैलेलूय! हैलेलूय! हैलेलूय!
और छाती पर मण्डराती हुई नीली तितली,
बताओ कब देखा तुमने पृथ्वी को
हँसते हुए आख़िरी बार?
गर्भ में पल रहे शिशु को
ऑक्सीजन नहीं पहुँच रहा,
पृथ्वी की नाक
अभी भी जकड़ी हुई है
दोनों उँगलियों के बीच।
स्वप्न में भागते-भागते
मुई सड़क ही ख़त्म हो गई
और वह किरदार निकल आया
नेत्रों से बाहर,
चुप! चुप! चुप!
धीरे से चलना उसके गालों के ढलान पर,
वह आधी नींद में है।
अचानक बह चले आँसू
और वह फिसल के आ गिरा नीचे
धम्म से तकिये के बग़ल
रखी चिट्ठी पर
और उसके भीगे शरीर से
मिट गये कुछ उपसर्ग और प्रत्यय।
उसे पढ़ने मत देना यह चिट्ठी
उठाओ और वापस जाओ स्वप्न में।
ये क्या? वह गहरी नींद में है अब
दूसरे स्वप्न के कपाट खुले हैं,
तुम्हारा किरदार नहीं वहाँ
सुनो! तुमने सुना नहीं क्या?
मैंने कहा पढ़ने मत देना,
ले जाओ पाट दो किसी घाटी पर।
ऐसी ही अनन्त चिट्ठियाँ
पृथ्वी की भुजाओं में पाटी गई हैं,
जिनके बारे में सिर्फ़ वही जानती है
किन्तु उसकी नाक जकड़ी हुई है
दो उँगलियों के बीच में।

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