बीमार बूढ़े के दोनों पैर बंधे हैं अस्पताल के पलंग से
इलाज का बिल चुकाए बिना कहीं वह देह से फ़रार न हो जाए
हाथ उसके आज़ाद हैं फिर भी
रीते हाथों को ग़ुस्से में वह जितना चाहे उछाले
मुँह से निकलती आवाज़ एकदम निरापद है
वह तटस्थता के दरम्यान सिर्फ़ गिड़गिड़ाता है

वारिसों ने जीते जी उसे रख दिया है रेहन
मूल का भुगतान हो तो वह मुक्त हो
ब्याज़ न अदा हो पाए तो भी क्या
वैश्विक वायरस के ख़िलाफ़
शोधार्थी उसे बनाना चाहते हैं
गिनीपिग का ज़िंदा विकल्प

उम्रदराज़ आदमी घर-परिवार के लिए
फालतू सामान भले ही हो
उसके गुर्दे, लीवर, विभिन्न अंग प्रत्यंग बेशक़ीमती हैं
मरने को छोड़ दिया गया आदमी चतुर कारोबारियों के लिए
ज़िंदा रहने की ज़िद पर अडिग बंदे के मुक़ाबले
वह हर हाल में बेहतरीन है

अस्पताल के पलंग से बंधा लाचार बूढ़ा
हमारे समय की सम्वेदनशील मिसाल है
वह जब कभी यहाँ से आज़ाद होगा
तब भी आख़िर कहाँ चला जायेगा
घूम-घूमकर करेगा दर्द का पुनर्पाठ ही
उबाऊ वृतांत को आजकल सुनता कौन है

तस्वीर में बीमार बूढ़े के चेहरे को
जानबूझकर कर दिया गया धूमिल
प्रत्येक बुढ़ा गया चेहरा पुरखों-सा लगता है
और सच इसके सापेक्ष बड़ा हौलनाक
धुंधला दिया है चेहरा सम्पादक ने यह सोच
लोग भयाक्रांत न हो जाएँ अपना अक्स देखकर!

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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