बुढ़िया ने गोद में रखा
अपने बुड्ढे का सिर
और मालिश करने लगी
सिर के उस हिस्से में भी
जहाँ से
बरसों पहले विदा ले चुके थे बाल

दोनों को याद आया
कि शैतान बच्चे टकला कहते हैं बुड्ढे को
और मन ही मन टिकोला मारना चाहते हैं
उसके गंजे सर पर

दोनों हँसे
अपने बचे हुए दाँत दिखाते हुए
बुढ़िया ने हँसते हुए टिकाना चाहा
(जितना वह झुक पायी)
झुर्रियों भरा अपना गाल बुड्ढे के माथे पर

बैलगाड़ी के एक बहुत पुराने पहिए ने
याददाश्त सम्भालते हुए गर्व से बताया—
“मैं ही लेकर आया था इनकी बारात!”

देवेश पथ सारिया की कविता 'स्त्री से बात'

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देवेश पथ सारिया
हिंदी कवि। कथेतर गद्य लेखन एवं कविताओं के अनुवाद में भी सक्रिय। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध। साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, बनास जन, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन, जनपथ, नया पथ, कथा, साखी, अकार, आधारशिला, बया, उद्भावना, दोआबा, बहुमत, परिंदे, प्रगतिशील वसुधा, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, कविता बिहान, गाँव के लोग, ककसाड़, अक्षर पर्व, निकट, मंतव्य, मुक्तांचल, उम्मीद, विश्वगाथा, गगनांचल, रेतपथ, कृति ओर, अनुगूँज, प्राची, कला समय, पुष्पगंधा आदि । समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, प्रभात ख़बर, दि सन्डे पोस्ट। वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, हिंदवी, कविता कोश, पोषम पा, हिन्दीनेस्ट, इंद्रधनुष, अनुनाद, बिजूका, पहली बार, समकालीन जनमत, मीमांसा, शब्दांकन, कारवां, हमारा मोर्चा, साहित्यिकी, द साहित्यग्राम, लिटरेचर पॉइंट, अथाई, हिन्दीनामा।