किसने कह दिया तुम्हें
कि मैं कविता लिखता हूँ
मैं कविता नहीं लिखता
मैंने तो सिर्फ़
जन-मन के दर्द के नीचे
एक रेखा खींच दी है
हाँ, दर्द के नीचे
फ़क़त एक रेखा
गहरी, बहुत गहरी
क्या करूँ,
व्यवस्था है बहरी!
पुनरावृत्ति दोष तो है
पर कहता हूँ
एक रेखा खींच दी है:
आपने नाहक
मुट्ठियाँ भींच ली हैं!

उस, चौड़े सपाट राजमार्ग पर
वह जो
पुलिस की गोली का शिकार
एक औरत
लम्बायमान पड़ी है
वह भी तो
व्यवस्था के ज़ुल्म को
(जन-मन के दर्द को)
रेखांकित कर रही है
मेरी रेखा
हक़ीक़त में
उसी लाश की प्रतीक है!

मदन डागा की कविता 'कुर्सी-प्रधान देश'

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