संसार उतना ही
जितना मैं चलकर
अपने पग से नाप सकूँ

प्रेम उतना ही
जितना मेरी हृदय से
जुड़ी धमनियों और
शिराओं में बहता हो

आसक्ति उतनी ही
जितनी सम्प्रेषित की
जा सके
शब्दों में

स्मृतियाँ उतनी ही
जितनी मैं वर्तमान
पर लाद ना सकूँ

विरह उतना ही
जिसकी वेदना का
द्रव्यमान
वहन कर पाने
का साहस हो

अपेक्षाएँ उतनी ही
जितनी परिमिति है
यथार्थ की

जीवन उतना ही
जितना अंजलियों
में समेटा जा सके

मृत्यु उतनी ही
जितनी हर एक
निष्प्राण वस्तु
में विद्यमान है।

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आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

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