‘Sarkari Neelami’
poem by Vishal Singh

बाबा ने उनके हिस्से की,
दुनिया पे ताना मेरा घर

घर के ऊपर से जाते थे
रोंदू बादल भी ख़ुश होकर

घर की यारी थी सूरज से
भेजा करता था किरणों को

घर से कुछ सौ गज दूरी पर
रहता था इक सुन्दर पोखर
पोखर तक जाकर मैं हर दिन
मेरे हिस्से के पोखर को
मटके में भर ले आता था

अपनी छत पर लेटे-लेटे,
अपने हिस्से के अम्बर को
हौले-हौले सहलाता था

छोटे-छोटे इन हाथों से
अकसर वो गिरगिट सा अम्बर
कुछ बित्तों में नप जाता था

कोई ले जाया करता था
टुकड़ा-टुकड़ा मेरा चँदा
चुपके से पर रख जाता था
वापिस से इक साबुत चँदा
कोशिश करता था लेने की
अपनी मुट्ठी में मैं चँदा
मुट्ठी में पर ना आता था
अकड़ू चँदा, पगला चँदा

ये नियती थी उस चँदा की
हो जाना था उसको अगवा

टूटे तारे से मिन्नत कर
गिर जाती थीं भारी पलकें
रफ़्ता-रफ़्ता गिर जाती थीं
चँदा की भी सारी पलकें
लौट-आता था भटका सूरज
खुल जाती थीं प्यारी पलकें

पैसों से पैसे वालों ने
मेरे हिस्से के मौक़ों को
हथियाए रक्खा पर मेरा
बचपन कानों में कहता था
रख जाएगा इक दिन कोई
मेरे हिस्से के मौक़ों को
वापिस से मेरी चौखट पर..

जैसे रख जाता था कोई
मेरे चँदा को चुपके से
वापिस अम्बर की चौखट पर

मेरे बचपन का दम निकला
जिस दिन होते देखी उसने
मेरे हिस्से के मौक़ों की
खुल्ली सरकारी नीलामी…

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