शैवाल मर रहे हैं

‘Shaiwal Mar Rahe Hain’, a poem by Nidhi Agarwal

प्रथम प्रेम की स्मृतियाँ
शैवालों-सी होती हैं
जिनके उगने के लिए
ज़रूरी होती है नमी।
तब वह दीवार के किन्हीं
अनचीन्हे कोनों में… वृक्ष की छाल,
शिलाओं और मीठे पानी के
जलाशयों, तालाबों के
सोपानों से लेकर,
उफनते समुद्र के किसी
नीरव-से छोर पर,
पाषाणों पर भी,
हर जगह उग आते हैं…
कुछ हरे, लाल नीले और भूरे
सुनहरे शैवाल

यूँ ही उग आती हैं
पहले प्रेम की भी हठी यादें।
आँखों में तैरती नमी से लेकर
रात-भर चुपचाप बहते सैलाब तक,
यह स्वपोषित स्मृतियाँ
निर्बाध विचरण किया करती हैं,
मन के दरवाज़ों की सीढ़ियों पर
पसर जाती हैं बिना बताये
इनकी चिकनी… हरित यादें,
हर आने-जाने वाले को
फिसलने को मजबूर करती हैं।

कोई सयाना संयमी ही
इन्हें पार कर पहुँच पाता है फिर
एक निश्छल मन के आँगन में
और रोप पाता है
प्रेम का एक नया बरगद,
जो फैलता जाता है, सब ओर
और अंततः घना होकर
रोक देता है रवि की
हर उस किरण को
जो ज़रूरी है शैवालों के
पोषण के लिए।
सोख लेता है सब ठहरी नमी
और बहा ले जाता है
अपने साथ सब कसक
बन एक बहता दरिया।
विस्मृत करा देता है
विचलित करती स्मृतियाँ

और बन पाता है वह
पहला मुक्कमल प्रेम!
क्षितिज पर फैले निर्मल
अरुणिम प्रकाश की तरह
तब खिल जाते हैं नन्हे फूल
मन आँगन में..
नैसर्गिग मनोहारी आभ लिए!