एक स्त्री ने भीतर से कुंडी लगायी
और भूल गयी
खोलने की विधि
या कि कुंडी के पार ही जनमी थी
एक स्त्री

उस स्त्री ने केवल कोलाहल सुना
देखा नहीं
कुछ भी

नाक की सीध चलती रही
जैसे कि घोड़ाचश्म पहने जनमी थी वो स्त्री
जैसे कोई पुरुष जनमा था
कवच, कुंडल पहने

दस्तकों ने बेचैन किया
तो साँकल से उलझ पड़ी वो स्त्री

इस उलझन पर बड़ी गोष्ठियाँ होती रहीं
पोप-पादरी
क़ाज़ी-इमाम
से लेकर
आचार्य-पुरोहित
ग्रह नक्षत्र
सब एकत्रित हुए

उन्होंने कहा—
करने को तो कुछ भी कर सकती है
किंतु साँकल से नहीं उलझ सकती
वो‌ स्त्री

उस स्त्री के भीतर की साँकल पर
संस्कृतियों के मान टिके हैं
और बंद कपाट के सहारे खड़ा है
गर्वीला इतिहास

उन्होंने कहा—
ईश्वर को न पुकारे वो स्त्री
वो नहीं आएगा
क्योंकि एक स्त्री के भीतर की बंद कुंडी
‘धर्म की हानि’ नहीं है

इस समय
मैं भीतर हूँ उस स्त्री के
और ज़ंग खायी कुंडी पर डाल रही हूँ
हौसले का तेल

मैं सिखा रही हूँ
एक स्त्री को भीतर की कुंडियाँ खोलना

क्या आपको आता है
किसी स्त्री के भीतर जाकर
बंद कुंडियाँ खोलने का हुनर?

Book by Sudarshan Sharma: