Tag: स्वप्न / ख़्वाब

Girija Kumar Mathur

मेरे सपने बहुत नहीं हैं

'Mere Sapne Bahut Nahi Hain', a poem by Girija Kumar Mathur मेरे सपने बहुत नहीं हैं छोटी-सी अपनी दुनिया हो, दो उजले-उजले से कमरे जगने को, सोने को, मोती-सी...
Hand Covering Face, Sexual Abuse, Body

आँखों में मरते सपने

'Aankhon Mein Marte Sapne', a poem by Santwana Shrikant उन लाखों युवतियों के नाम लिख रही हूँ दो शब्द, जिनकी देह पर तोड़ देती है अंधी मर्दानगी अपना...

एक काफ़िर सपना….

जब खिसियाई दोपहर में बदल रही थी मायूस सुबह, बासी हो चला था ताज़ी अखबार, दीवाल पर सूख चुकी थी चाय की बेरंग रंगत, दिन के कैनवास पर- खींचकर आड़ी-सीधी रेखाएँ पिघल...

मेरे ख़्वाब

मेरे ख़्वाब ही मेरा सब कुछ हैं जिनमें मैं कभी किसी झील पर उतरती पेड़ियों की आख़िरी सीढ़ी पर बैठकर बहते पानी की धुन में...

पिघलती नींदें

तुम बोते हो नींदें इसलिए कि सपनों की फ़सल काट सको लेकिन कभी सोचा है तुमने उन जलती सुलगती आँखों के बारे में जिनके सपने हर रात के बाद फट पड़ते...

जाने वाले ख़्वाब दिखाकर चले गये

हमको इक किरदार बताकर चले गए जाने वाले ख़्वाब दिखाकर चले गए आये थे जो मेरी ख़ैर-ख़बर लेने अपने दिल का हाल सुनाकर चले गए क्या बोलूं अब...
Baba Nagarjuna

चंदू, मैंने सपना देखा

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू,...
Explode, Explosion, Blast, Light

दो नज्में

Poems: Usama Hameed 1 जब जब धूप पकती है, पीली पड़ती है शाम, मायूस मुँह बिसोरे चली आती है- एक उम्र गुज़र जाती है! 2 तुम्हारे जाते ही मुहब्बत ज़दा सारे ख्वाब खुदकुश हमलावर की तरह भक्क...

पुरनम आँखों के ख़्वाब

"बैठो यहाँ, अगर जंग ख़त्म करनी है तो मत जाओ। ये ज़रूरी नहीं कि किसी के हारने पर ही जंग ख़त्म हो। कोई लड़ने न जाये तो जंग वैसे भी ख़त्म हो जाएगी।"
Man, Split, Half

सपनों को स्थगित करना 

1902 में जन्में महान अमेरिकी अश्वेत लेखक लैंग्स्टन ह्यूज़ की लगभग लोकगीत बन चुकी कविता हार्लेम (Harlem) पढ़ने के बाद सपनों को स्थगित करना होता है...
Mahatma Gandhi

मेरे सपनों का भारत

"यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और यदि उस समय मैं जीवित रहा, तो मैं भारत में नहीं रहना चाहूँगा। तब वह मेरे मन में गर्व की भावना उत्पन्न नहीं करेगा। मैं भारत से उसी तरह बंधा हुआ हूँ, जिस तरह कोई बालक अपनी माँ की छाती से चिपटा रहता है; क्योंकि मैं महसूस करता हूँ कि वहाँ मुझे अपनी उच्चतम आकांक्षाओं की पुकार का उत्तर मिलता है। यदि किसी कारण मेरा यह विश्वास हिल जाए या चला जाए, तो मेरी दशा उस अनाथ के जैसी होगी जिसे अपना पालक पाने की आशा ही न रही हो।"

मिट्टी के पौधे में सपनों के फूल

मिट्टी के पौधे में सपनों के फूल, जीवन की सेज पर किस्मत दुकूल। किस्मत दुकूल ओढ़ सिहरे अनिश, मौसम अनुकूल हो या मौसम प्रतिकूल। सांसें रफू करते बीते...
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