Tag: Gaurav Bharti

Gaurav Bharti

ठहरिए, मैं कुछ कहना चाहता हूँ

1 कुछ दिन पहले की बात है आँखों के सामने का दृश्य धूमिल होता गया और भरभराते हुए मेरा जिस्म लुढ़क गया मुझे मेरे दोस्त ने सम्भाला होश आने के बाद उसकी...
Gaurav Bharti

कविताएँ: फ़रवरी 2021

तुम्हारे साथ थोड़ा और मनुष्य हुआ मैं तुम्हारे साथ तुम्हारा शहर अपना-सा लगा तुम्हारे साथ मैंने जाना— कि शहर को जानना हो तो शहर में बहती नदी को जानना चाहिए नदी की...
Gaurav Bharti

अलविदा

मैं कोशिश कर रहा हूँ फिर भी नहीं लौट पाया अगर कोई बात नहीं मेरी यादें लौटती रहेंगी तुम तक तुम्हें छूती रहेंगी तुम्हारे कानों में फुसफुसाकर कहेंगी कुछ ज़्यादा...
Gaurav Bharti

कविताएँ: दिसम्बर 2020

1 हॉस्टल के अधिकांश कमरों के बाहर लटके हुए हैं ताले लटकते हुए इन तालों में मैं आने वाला समय देख रहा हूँ मैं देख रहा हूँ कमरों के भीतर अनियन्त्रित...
Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथ तुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फल मैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Gaurav Bharti

मैं ख़ुद को हत्यारा होने से बचा रहा हूँ

बहुत ही लापरवाह रहा हूँ मैं अपनी देह को लेकर पहनने-ओढ़ने का शऊर भी नहीं रहा कभी मुझे ध्यान नहीं रहता कब बढ़ जाते हैं मेरे नाख़ून झड़ने लगे...
Gaurav Bharti

नैराश्य, समय का शोक-गीत

नैराश्य जो मुझे भूल गए मैंने उन्हें भी याद रखा जिन्होंने मुझे याद किया उनके लिए दुआएँ माँगीं मैंने ख़ूब किया इंतज़ार शजर की तरह फिर एक दिन चिड़िया बन...
Gaurav Bharti

स्थायी पता

स्थायी पते से दूर अनजान शहर में जब हम ढूँढते हैं कोई अस्थायी पता किराए के किसी कमरे में ख़र्च कर रहे होते हैं जब अपना वर्तमान और जुटा रहे...
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;)