Tag: Gaurav Bharti
ठहरिए, मैं कुछ कहना चाहता हूँ
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कुछ दिन पहले की बात है
आँखों के सामने का दृश्य
धूमिल होता गया
और भरभराते हुए
मेरा जिस्म लुढ़क गया
मुझे मेरे दोस्त ने सम्भाला
होश आने के बाद
उसकी...
कविताएँ: फ़रवरी 2021
तुम्हारे साथ थोड़ा और मनुष्य हुआ मैं
तुम्हारे साथ
तुम्हारा शहर
अपना-सा लगा
तुम्हारे साथ
मैंने जाना—
कि शहर को जानना हो तो
शहर में बहती नदी को जानना चाहिए
नदी की...
अलविदा
मैं कोशिश कर रहा हूँ
फिर भी नहीं लौट पाया अगर
कोई बात नहीं
मेरी यादें लौटती रहेंगी तुम तक
तुम्हें छूती रहेंगी
तुम्हारे कानों में फुसफुसाकर कहेंगी कुछ
ज़्यादा...
कविताएँ: दिसम्बर 2020
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हॉस्टल के अधिकांश कमरों के बाहर
लटके हुए हैं ताले
लटकते हुए इन तालों में
मैं आने वाला समय देख रहा हूँ
मैं देख रहा हूँ
कमरों के भीतर
अनियन्त्रित...
कविताएँ: अक्टूबर 2020
किसी रोज़
किसी रोज़
हाँ, किसी रोज़
मैं वापस आऊँगा ज़रूर
अपने मौसम के साथ
तुम देखना
मुझ पर खिले होंगे फूल
उगी होंगी हरी पत्तियाँ
लदे होंगे फल
मैं सीखकर आऊँगा
चिड़ियों की...
मैं ख़ुद को हत्यारा होने से बचा रहा हूँ
बहुत ही लापरवाह रहा हूँ मैं
अपनी देह को लेकर
पहनने-ओढ़ने का शऊर भी नहीं रहा कभी
मुझे ध्यान नहीं रहता
कब बढ़ जाते हैं मेरे नाख़ून
झड़ने लगे...
नैराश्य, समय का शोक-गीत
नैराश्य
जो मुझे भूल गए
मैंने उन्हें भी याद रखा
जिन्होंने मुझे याद किया
उनके लिए दुआएँ माँगीं
मैंने ख़ूब किया इंतज़ार शजर की तरह
फिर एक दिन चिड़िया बन...
स्थायी पता
स्थायी पते से दूर
अनजान शहर में
जब हम ढूँढते हैं कोई अस्थायी पता
किराए के किसी कमरे में
ख़र्च कर रहे होते हैं जब अपना वर्तमान
और जुटा रहे...

