नैराश्य

जो मुझे भूल गए
मैंने उन्हें भी याद रखा
जिन्होंने मुझे याद किया
उनके लिए दुआएँ माँगीं

मैंने ख़ूब किया इंतज़ार शजर की तरह
फिर एक दिन चिड़िया बन उड़ गया

मैं कभी गरजा बादलों की तरह
तो कभी बारिश-सा बरस पड़ा

कभी थिरका
तो ख़ूब थिरका लोकगीतों की धुन पर
कभी रोया
तो ख़ूब रोया बंद कमरे की बत्ती बुझाकर

मैं बार-बार लौटता रहा अपने गाँव
बदलती हवा को सूँघता रहा हर बार

मैं तलाशता रहा पगडंडियाँ
मुझे सड़कें मिलीं
मैं ढूँढता रहा घर
मुझे दीवारें मिलीं

मैं चल पड़ा दक्षिण की दिशा में
सम्भावनाएँ तलाशते हुए
जहाँ एक नदी थी
वहाँ अब रेत है
जहाँ उम्मीद थी, वहाँ आपदा है

मैं किस मुँह से देखूँ अपना चेहरा आईने में
कि मैं जो हूँ, वह मैं नहीं हूँ
कि मैं जो था, वह नहीं रहा शेष

मेरा वजूद पड़ा है
श्मशान में टूटे बिखरे घड़े-सा
मुझे देखना हो तो कोई उजड़ा हुआ गाँव देखो

मैं बस भी गया तो कैसे होगा बसर
शिकस्ता कश्ती को अब किस बात का डर
डूबना तय है
तय है डूबना
कैसे होगा बसर?

दीवारें मुझे पाट देना चाहती हैं
आकाश मुझे निगल जाना चाहता है
हवा दबा देना चाहती है मुझे
आग जला देना चाहती है मुझे
चीख़ें भर गई हैं मेरे भीतर इस क़दर
कि मैं ख़ुद को छूता हूँ तो मेरे कान बजने लगते हैं

ओ! मेरी पृथ्वी
मुझे अपनी गोद में लो
मैं सोना चाहता हूँ थोड़ी देर
कि जहाँ इंतज़ार है, वहाँ सन्नाटा है अब
कि जहाँ आकाश है, वहाँ अँधेरा है अब
कि जहाँ मैं हूँ, वहाँ कुछ भी नहीं है अब।

समय का शोक-गीत

बहुत उम्मीद से
मोबाइल को देखता हूँ
व्हाट्सएप्प खोलता हूँ
चेक करता हूँ मैसेंजर
हो आता हूँ ईमेल के इनबॉक्स तक
दिन-भर में कितनी ही बार

उम्मीद लिए जाता हूँ
इंतज़ार लिए लौटता हूँ

ख़ाली बैठे-बैठे सोचता हूँ
न जाने किस समय में फँस गया हूँ
कोई मुझ तक नहीं पहुँचता
न मैं ही ठीक-ठीक पहुँच पा रहा हूँ कहीं

ख़ाली सड़क पर
ख़ुद की चहलक़दमी को सुनते हुए
झींगुरों को अपने क़रीब, बेहद क़रीब पाता हूँ
झींगुर गा रहा है
समय का शोक गीत…

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