Tag: Gaurav Bharti

Abstract, Human

कविताएँ: दिसम्बर 2021

एक यूँ ही मौत जिन दिनों मैं उलझ रहा था अपनी नींद से जिन दिनों मैं तोते की तरह रट रहा था ऐतिहासिक तथ्य जिन दिनों रातें बड़ी मुश्किल से...
Gaurav Bharti

कविताएँ: नवम्बर 2021

यात्री भ्रम कितना ख़ूबसूरत हो सकता है? इसका एक ही जवाब है मेरे पास कि तुम्हारे होने के भ्रम ने मुझे ज़िन्दा रखातुम्हारे होने के भ्रम में मैंने शहर...
Gaurav Bharti

कविताएँ: सितम्बर 2021

हादसा मेरे साथ प्रेम कम उसकी स्मृतियाँ ज़्यादा रहींप्रेम जिसका अन्त मुझ पर एक हादसे की तरह बीता मुझे उस हादसे पर भी प्रेम आता है। गंध मैं तुम्हें याद करता हूँ दुनिया...
Night, Lonely, Alone, Road

बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के (चार)

आदमी, शरीर से ही नहीं थकता, मन से भी थकता है। मन से थका हुआ आदमी सहानुभूति का विषय है, शरीर से थका हुआ...
Gaurav Bharti

कम्पाउण्डर

लोग जहाँ खेतों में खप जाते हैंशहर से चली हुई बिजली जिनके यहाँ तक आते-आते बीच में ही कहीं किसी खम्भे पर दम तोड़ देती हैज़रूरत...
Gaurav Bharti

आवेदन पत्र

भाषा के शिक्षक ने पारम्परिक कौशल के साथ कार्य-कारण सम्बन्धों को साधना सिखाया कुछ शब्द जो हर फ़्रेम में फ़िट बैठते उन्हें रटने की बात कही इस विश्वास के साथ...
Gaurav Bharti

बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के (तीन)

कल रात मैंने चश्मे के टूटे हुए काँच को जोड़ते हुए महसूस किया कि टूटे हुए को जोड़ना बहुत धैर्य का काम है। इसके...
Gaurav Bharti

बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के (दो)

सम्वाद महज़ शब्दों से तो नहीं होता। जब शब्द चूक जाते हैं, तब स्पर्श की अर्थवत्ता समझ आती है। ग़ालिब कहते हैं— "मौत का...
Gaurav Bharti

बिखरा-बिखरा, टूटा-टूटा : कुछ टुकड़े डायरी के (एक)

बहुत बुरा वक़्त है। ऐसा लगा था सब ठीक होने वाला है। लेकिन बुरा वक़्त इतनी जल्दी पीछा कहाँ छोड़ता है? श्मशान लाशों से...
Gaurav Bharti

हम मारे गए

हमें डूबना ही था और हम डूब गएहमें मरना ही था और हम मारे गएहम लड़ रहे थे कई स्तरों पर लड़ रहे थे हमने निर्वासन का दंश...
Gaurav Bharti

दुःख

सपनों के डर से मैंने कई रातें दिन की तरह बितायीं और दिन में बेहोश होकर सोया बहुत बाद में मुझे मालूम हुआ नींद और बेहोशी में फ़र्क़ होता...
Gaurav Bharti

ठहरिए, मैं कुछ कहना चाहता हूँ

1 कुछ दिन पहले की बात है आँखों के सामने का दृश्य धूमिल होता गया और भरभराते हुए मेरा जिस्म लुढ़क गयामुझे मेरे दोस्त ने सम्भाला होश आने के बाद उसकी...

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Naomi Shihab Nye

नेओमी शिहैब नाय की कविता ‘प्रसिद्ध’

नेओमी शिहैब नाय (Naomi Shihab Nye) का जन्म सेंट लुइस, मिसौरी में हुआ था। उनके पिता एक फ़िलिस्तीनी शरणार्थी थे और उनकी माँ जर्मन...
Shehar Se Dus Kilometer - Nilesh Raghuwanshi

किताब अंश: ‘शहर से दस किलोमीटर’ – नीलेश रघुवंशी

'शहर से दस किलोमीटर' ही वह दुनिया बसती है जो शहरों की न कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने...
Shri Vilas Singh

श्रीविलास सिंह की कविताएँ

सड़कें कहीं नहीं जातीं सड़कें कहीं नहीं जातीं वे बस करती हैं दूरियों के बीच सेतु का काम, दो बिंदुओं को जोड़तीं रेखाओं की तरह, फिर भी वे पहुँचा देती...
Ret Samadhi - Geetanjali Shree

गीतांजलि श्री – ‘रेत समाधि’

गीतांजलि श्री का उपन्यास 'रेत समाधि' हाल ही में इस साल के लिए दिए जाने वाले बुकर प्राइज़ के लिए चयनित अन्तिम छः किताबों...
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अनुवाद: पंखुरी सिन्हा युद्ध के बाद ज़िन्दगी कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं बग़ीचे की झाड़ियाँ हिलाती हैं अपनी दाढ़ियाँ बहस करते दार्शनिकों की तरह जबकि पैशन फ़्रूट की नारंगी मुठ्ठियाँ जा...
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तुम देखना चांद तुम देखना चांद एक दिन कविताओं से उठा ज्वार अपने साथ बहा ले जाएगा दुनिया का तमाम बारूद सड़कों पर क़दमताल करते बच्चे हथियारों को दफ़न...
Shyam Bihari Shyamal - Sangita Paul - Kantha

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जयशंकर प्रसाद के जीवन पर केंद्रित उपन्यास 'कंथा' का साहित्यिक-जगत में व्यापक स्वागत हुआ है। लेखक श्यामबिहारी श्यामल से उपन्यास की रचना-प्रकिया, प्रसाद जी...
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किताब अंश: शाहीन बाग़ – लोकतंत्र की नई करवट

भाषा सिंह की किताब 'शाहीन बाग़ : लोकतंत्र की नई करवट' उस अनूठे आन्दोलन का दस्तावेज़ है जो राजधानी दिल्ली के गुमनाम-से इलाक़े से...
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सहेजने की आनुवांशिकता में

कहीं न पहुँचने की निरर्थकता में हम हमेशा स्वयं को चलते हुए पाते हैं जानते हुए कि चलना एक भ्रम है और कहीं न पहुँचना यथार्थदिशाओं के...
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