Tag: Hindi kavita
हरिवंशराय बच्चन की पहली और अन्तिम कविता
यह जानना एक आम जिज्ञासा है कि एक कविता लिखते समय किसी कवि के मन में क्या चल रहा होता है! इसके बावजूद कि...
झेलम
प्रेम, भरोसा, समर्पण.. ये सारे शब्द एक ऐसी गुत्थी में उलझे रहते हैं कि किसी एक की डोर खिंचे तो तनाव दूसरों में भी...
प्रेम की एक कविता ताल्लुक़ के कई सालों का दस्तावेज़ है
त्याग, समर्पण और यहाँ तक कि अनकंडीशनल लव भी प्रेम में पुरानी बातें हैं। और पुरानी इसलिए क्योंकि जब भी किसी ने इन शब्दों...
दर्पण को घूरते-घूरते
आज कुछ सत्य कहता हूँ,
ईर्ष्या होती है थोड़ी बहुत,
थोड़ी नहीं,
बहुत।
लोग मित्रों के साथ,
झुंडों में या युगल,
चित्रों से,
मुखपत्र सजा रहें हैं..
ऐसा मेरा कोई मित्र नहीं।
कुछ...
जीवन और कविता
जीवन और कविता, दोनों सहोदर होंगे किसी जन्म,
एक-सी दोनों की ही प्रवृत्ति, एक-से चालचलन,
इनका धर्म निर्भर करता है पानी के उस एक बवंडर पर,
जो...
कैसे रहे सभ्य तुम इतने दिनों
राहुल द्रविड़। एक ऐसा खिलाड़ी जिसने खेल को एक जंग समझा और फिर भी जंग में सब जायज़ होने को नकार दिया। एक ऐसा...
इस बार बसन्त के आते ही
इस बार बसन्त के आते ही
मैं पेड़ बनूँगा एक बूढ़ा
और पुरवा के कान में फिर
जाकर धीरे से बोलूँगा-
"शरद ने देखो इस बारी
अच्छे से अपना...
मैं समर अवशेष हूँ
'कुरुक्षेत्र' कविता और 'अँधा युग' व् 'ताम्बे के कीड़े' जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त...
तमाशा
उन्मादकता की शुरूआत हो जैसे
जैसे खुलते और बन्द दरवाज़ों में
खुद को गले लगाना हो
जैसे कोनों में दबा बैठा भय
आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए
जैसे...
‘शदायी केह्न्दे ने…’ – रमेश पठानिया की कविताएँ
आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या...
स्वयं हेतु
अनुवाद: पुनीत कुसुम
एक
मैं अपनी डायरी में कुछ बेतरतीब शब्द लिखती हूँ
और कहती हूँ उसे बाइबिल
जिसमें 'प्रेम' अन्तिम शब्द है
दो
'यकीन' जैसे शब्दों के नीचे मैं...
कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ
तुम कहती हो
"कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ"
मगर, क्यों मान लेती हो?
आख़िर, क्यों मान लेती हो?
पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व...











