Tag: Migration

Rohit Thakur

घटना नहीं है घर लौटना

रोहित ठाकुर : तीन कविताएँ घर लौटते हुए किसी अनहोनी का शिकार न हो जाऊँ दिल्ली - बम्बई - पूना - कलकत्ता न जाने कहाँ-कहाँ से पैदल चलते...
Rahul Boyal

राहुल बोयल की कविताएँ

1 नदियों में लहलहा रहा था पानी और खेतों में फ़सल, देखकर हर ओर हरियाली हरा हो ही रहा था मन कि अचानक फट पड़ता है बेवक़्त काला पड़ा हुआ...
Gaurav Bharti

स्थायी पता

स्थायी पते से दूर अनजान शहर में जब हम ढूँढते हैं कोई अस्थायी पता किराए के किसी कमरे में ख़र्च कर रहे होते हैं जब अपना वर्तमान और जुटा रहे...
Water, Boat, Flood

विस्थापित अन्तरावकाश

जीवन के जिस अन्तरावकाश में सुनी जा सकती थी धरती और चाँद की गुफ़्तगू, वहाँ मशीनी भाषाओं में हुए कई निर्जीव सम्वाद। जहाँ तराशा जा सकता था प्रेम का नया...
Gaurav Bharti

गौरव भारती की कविताएँ – IV

Poetry by Gaurav Bharti क़ैद रूहें उनका क्या जो नहीं लौटते हैं घर कभी-कभार देह तो लौट भी जाती है मगर रूहें खटती रहती हैं मीलों में खदानों में बड़े-बड़े निर्माणाधीन मकानों में इस उम्मीद...
Bird, Water

विस्थापन के अंतरावकाश में

'Visthapan Ke Antaravkash Mein', a poem by Pranjal Rai एक ख़ानाबदोश की अन्तहीन यात्रा-सी ठौर दर ठौर सरकती है ज़िंदगी कि कुछ यात्राओं में पिछले क़दम की थकान ही अगले...
Prabhat

प्रभात की कविताएँ

क़स्बे का कवि वह कोई अधिकारी नहीं है कि लोग जी सर, हाँ सर कहते हुए काँपें उसके सामने नेता नहीं है कि इंसानों का समूह पालतू कुत्तों के...
A K Ramanujan

स्टापू

"गली का यही खेल अफ्रीका में, जर्मनी में देखकर अचरज हुआ। खेल ही ऐसा है पड़ोस में अफ्रीका सामने के घर में जर्मनी.."
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;)