Tag: Premchand

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नमक का दारोगा

'Namak Ka Daroga', a story by Premchandजब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग...
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बासी भात में खुदा का साझा

शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई है, तो गौरी...
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दो बैलों की कथा

"अबकी बड़ी मार पड़ेगी।""पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहाँ तक बचेंगे?""गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा है, दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं।"मोती बोला- "कहो तो दिखा दूँ मजा मैं भी, लाठी लेकर आ रहा है।"हीरा ने समझाया- "नहीं भाई! खड़े हो जाओ।""मुझे मारेगा तो मैं एक-दो को गिरा दूँगा।""नहीं, हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।"
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धिक्‍कार

"मेरे बड़ों को मुझपर अनेकों अधिकार हैं। बहुत-सी बातों में मैं उनकी इच्छा को कानून समझता हूँ, लेकिन जिस बात को मैं अपनी आत्मा के विकास के लिये शुभ समझता हूँ, उसमें मैं किसी से दबना नहीं चाहता। मैं इस गर्व का आनंद उठाना चाहता हूँ कि मैं स्वयं अपने जीवन का निर्माता हूँ।"
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शिकार

"तू मेरे बीच में बोलनेवाली कौन है? मेरी जो इच्छा होगी वह करूँगा। तू अपना रोटी-कपड़ा मुझसे लिया कर। तुझे मेरी दूसरी बातों से क्या मतलब? मैं तेरा गुलाम नहीं हूँ।"
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कायर

युवक का नाम केशव था, युवती का प्रेमा। दोनों एक ही कॉलेज के और एक ही क्लास के विद्यार्थी थे। केशव नये विचारों का...
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दिल की रानी

"अमन का कानून जंग के कानून से जुदा है।""सल्तनत किसी आदमी की जायदाद नहीं बल्कि एक ऐसा दरख्त है, जिसकी हरेक शाख और पत्ती एक-सी खुराक पाती है।"
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ज्योति

"वह शायद सारे संसार की स्त्रियों को अपने ही रूप में देखना चाहती थी। कुत्सा में उसे विशेष आनंद मिलता था।""प्रेम के शब्द में कितना जादू है! मुँह से निकलते ही जैसे सुगंध फैल गई। जिसने सुना, उसका हृदय खिल उठा। जहाँ भय था, वहाँ विश्वास चमक उठा। जहाँ कटुता थी, वहाँ अपनापा छलक पड़ा। चारों ओर चेतनता दौड़ गई। कहीं आलस्य नहीं, कहीं खिन्नता नहीं।""मन की प्रसन्नता व्यवहार में उदारता बन जाती है।"
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बड़े भाई साहब

"सालाना इम्तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गये, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अंतर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आड़े हाथों लूँ- आपकी वह घोर तपस्या कहाँ गयी? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्वल भी हूँ।"
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नशा

'Privilege' वह नशा है जो आपके दूसरों पर लाख अत्याचार करने के बावजूद आपको खुद की विवेचना करने का मौक़ा नहीं देता! और इसे बखूबी दिखाया है प्रेमचंद ने अपनी इस कहानी में! पढ़िए :)
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शान्ति

"मैं व्रत के बदले में व्रत चाहती हूँ। जीवन का कोई दूसरा रूप मेरी समझ में नहीं आता।"
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बेटों वाली विधवा

"मैंने घर बनवाया, मैंने संपत्ति जोड़ी, मैंने तुम्हें जन्म दिया, पाला और आज मैं इस घर में गैर हूँ? मनु का यही कानून है? और तुम उसी कानून पर चलना चाहते हो?"

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