Poem: ‘The Cold Within’ by James Patrick Kinney
अनुवाद: प्रीता अरविन्द

पूस की घनी अँधेरी सर्द रात में
छः राहगीर जो एक-दूसरे से
परिचित न थे,
एक मुसाफ़िरख़ाने में बैठे थे
सुबह के इंतज़ार में
अलाव जलाए हुए
अलाव को घेरकर

सभी के पास एक-एक
लकड़ी का टुकड़ा भी था

कुछ ही देर में अलाव
बुझने लगा
और लकड़ी देनी थी
आग को जलता रखने के लिए

पहला राहगीर एक गोरी महिला थी
उसने अपनी लकड़ी आग के हवाले नहीं की,
बाक़ी पाँच में एक काला जो था

दूसरे आदमी ने भी अपनी लकड़ी
अपनी पीठ पीछे छिपाकर रख ली
बाक़ी में से एक उसके चर्च का न था

तीसरे के फटे पुराने कपड़ों से
उसकी मुफ़लिसी टपकती थी
उसने अपना कंधा उचकाते
एक अमीर की जान बचाने के लिए
अपनी लकड़ी देने से मना कर दिया

चौथा अमीर आदमी
चुपचाप बैठा रहा
अपनी अकूत सम्पत्ति
का हिसाब लगाता रहा
अपने ख़ून-पसीने से अर्जित
किसी वस्तु को
किसी निठल्ले आलसी ग़रीब
के लिए छोड़ना उसे
मंज़ूर न था

पाँचवाँ आदमी काला था
रंग भेद की आग में
ज़िंदगी भर जला था,
अपनी लकड़ी एक गोरे
को बचाने के लिए
देना उसे पसंद न था

छठा और अंतिम आदमी
स्वाभाविक स्वार्थी था
बिना कुछ लिए कभी
किसी को कुछ नहीं
दिया था उसने
खेल का यह नियम
उसे किसी भी क़ीमत पर
तोड़ना मंज़ूर न था

सुबह सभी अपनी-अपनी
लकड़ी अपने हाथ लिए
शांत पड़े थे

वे बाहर की ठण्ड से नहीं
अपने अन्दर की सर्दी
से मरे थे…