‘Tumhein Bhi Usi Ishwar Ne Banaya’, a poem by Rupam Mishra

जब भी मुझे सदियों की पीड़ा को
परिभाषित करना पड़ा
तो स्त्री और किन्नर ही पहली पंक्ति में आए!

दर्द के नाते से तो हम एक ही जाति के हुए
आख़िर आह ही तो हम दोनों नस्लों की पहचान है
उस सम्बन्ध से तो हम सगे हैं

ऐ गमेआशना! कभी आओ ना मिलकर रोयेगें
तुम्हें ही बताना है कि
कब, कहाँ और कैसी तल्खियाँ चिपकी हैं मन पर

बचपन में तुम्हें देखते ही डर जाना
बड़े होने पर इन्तहां तक नफ़रत की
बसों में, ट्रेन में, बाज़ार-मेले में तुम मिल जाते थे
घृणा से मुँह फेर लेती थी
सब के लिए माफ़ी माँगनी है

मुझे लगता था कि यह अश्लीलता तुम्हारी फ़ितरत है
घिन आती थी मुझे तुम्हारी भाषा से
अब जाना तुम्हारा कोई क़सूर नहीं
पुरुष लिप्सा की लिजलिजी दुनिया में
पेट भरने के लिए
तुम्हें यही आसान लगा

वो तुम्हारे गंदे इशारों और भद्दी गालियों
पर बेहयाई से हँसकर पैसे निकालते हैं
आख़िर स्त्रियों का सुहाग और संतान अशीषते
कहाँ पेट भरता तुम्हारा!

अब तुम्हें देखते ही मन करुणा से भर जाता है
तुम्हें भी उसी ईश्वर ने बनाया
जिसने हमें बनाया
तुम्हें भी चोट लगने पर पीड़ा होती है
तुम्हें भी प्यार करना भाता है
तुम भी हमारी तरह जन्म लेने पर रोये थे
तुमने भी पहली बार माँ शब्द ही कहा होगा

हमारे आसुओं का स्वाद निश्चित एक ही होगा
और भाषा की शायद ज़रूरत ही न पड़े हमें

घर में देवर की शादी थी, नाचते हुए एक बार तुमने
नेग के लिए एक नई दुल्हन की ठोढ़ी
दुलार से छू ली थी!
भय और घृणा से काँपने वाली वो जाहिल मैं ही थी!
लगा था कि किसी गलीज़ जानवर ने छू लिया!

अब सोचकर लज्जित होती हूँ कि
कितनी अमानवीयता थी मुझमें…
एक अनगढ़ प्रेम ने मुझे सबसे प्रेम करना सिखा दिया।

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