तुमसे उद्भव मेरा

‘Tumse Udbhav Mera’, a poem by Santwana Shrikant

मैंने तुमसे प्रेम किया
बैचैन हुई, नींद त्यागी,
तुम्हें जो पसन्द था,
उसे पसन्द किया,
आख़िर में मेरे पास
कुछ नहीं बचा मेरा।
और तुम हमेशा
इस प्रायश्चित में रहे
कि मुझे तुमसे प्रेम नहीं!
मैं जब कभी मूँदती हूँ आँखें,
मेरा माथा चूमते हुए
दिखायी देते हो तुम,
बाँहों में लेकर सुनाते हो
धरती की लोरियाँ,
हालाँकि
वास्तविकता यह नहीं है।
तुम ब्रह्माण्ड हो
जहाँ से हुआ उद्भव मेरा,
हम दोनों के लिए
प्रेम के मायने
इतने अलग हैं
जैसे-
मेरे मौन में तुम्हारा होना
मेरे हर ख़याल की
शुरुआत और अन्त का
तुमसे होकर गुज़रना।
यहाँ तक कि
प्रेम का पर्याय तुम हो।
तुम्हारे लिए प्रेम का
प्रारब्ध देह है
इसलिए अब मैं
इस प्रेम से विदा लेती हूँ
और स्वयं से भी।