1

लगता है आख़िरकार
वसंत ने भी शिशिर के आगे
आत्म-समर्पण करके
समझौता कर लिया है
जैसे कवियों ने नेताओं से।

तभी तो
पता नहीं लगता
वसंत कब आया, कब चलता बना
या आया ही नहीं।

निःसंदेह
पत्ते अकारण ही झरकर
सड़कों पर दालान में भीतर तक बिखर गए हैं
मंजरी की महक सहमी-सी कभी-कभी
कमरे में घुस आती है
फीकी-फीकी मुरझाई-सी सरसों
या इक्का-दुक्का सकुचाए बुझे-बुझे-से पलाश
दीख जाते हैं
पर हवा—
हवा कुछ दूसरी ही है
बहकी-बहकी
सुहानी नहीं
धूल के अंधड़-सी या बेहद बर्फ़ीली।

दृश्य वही है
पर सम्वेदन भिन्न है
आस्वाद बदल गया है
मिलावटी घी की भाँति।

कितना सुंदर लगता है प्रत्येक झूठ
कितनी आकर्षक है सम्वेदनहीनता
या मिथ्या सम्वेदन की आसानी का कवच
हम सभी ने अपने-अपने शिशिर से
समझौता कर लिया है।

2

वसंत ऐसा झूठा भविष्य है
जो आकर भी कभी नहीं आता
संकल्प पत्तों की तरह झरते जाते हैं
और ख़ाली मन
नंगा ठूठ जैसा खड़ा
अंधड़ के थपेड़े सहता हुआ
फाँकता रहता है—
धूल… धूल… सिर्फ़ धूल…।

धूमिल की कविता 'वसंत'

Book by Nemichandra Jain: