अनुवाद: पुनीत कुसुम

मेरे जैसी औरतें
बोलना नहीं जानतीं
एक शब्द उनके गले में चुभता है
उस काँटे की तरह
जिसे वे निगलना चाहती हैं

मेरे जैसी औरतें
विलाप के अलावा कुछ नहीं जानतीं
अशिष्ट विलाप
अनायास
घनघोर
एक कटी हुई धमनी की तरह

मेरे जैसी औरतें
वार सहती हैं
और वापिस वार करने की हिम्मत नहीं करतीं

वे क्रोध से काँपती हैं
उसे वश में करती हैं

पिंजरों में क़ैद शेर के जैसे
मेरे जैसी औरतें
स्वप्न देखती हैं
आज़ादी का..

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