बहुत अर्से से यह स्त्री सोयी नहीं है
उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे
इसका प्रमाण हैं
समस्त सृष्टि को
अपने आग़ोश में लेकर
उसे विश्राम दिलाने का दावा
करती रात्रि का अहं
चूर-चूर कर दिया है इस स्त्री ने
और इससे हारी रात
उसकी बची-खुची नींद भी लेकर
अपना प्रतिशोध पूरा करती है

एक मीठी नींद
जिस पर सभी का हक़ है—
रात के हर प्रहर में
हड़बड़ाकर उठती इस स्त्री के हक़ पर
डाला गया है डाका
कोई एक सपना पूरा न होने की
पीड़ा से कराहती इस स्त्री ने
देखे दिन में सपने और
पागल क़रार दी गई वह

आसान है एक स्त्री की नींद छीन लेना
नहीं है आसान उसकी चुप्पी को समझना
रात में जगती स्त्री की चुप्पी में
उभरती हैं क‌ई-क‌ई आवाज़ें
उनके शोर से दरक जाती है पृथ्वी
काँप जाती है अंधेरी रात

क्या तुम जानते हो
रात में जगती स्त्री की चुप्पी से
थम जाता है सारा वजूद
पेड़ पंछी आसमान सितारे हवा
सभी शामिल होकर कराह उठते हैं
थपकियाँ देकर उस स्त्री को
सुलाने की चेष्टा करता है अंतरिक्ष
जिस स्त्री ने हर बार
अपनी नींद परे रखकर
गायी हैं उसके लिए मीठी लोरियाँ
आप सोते रहते हैं एक गहरी नींद
आपके बग़ल में छत ताकती
स्त्री के सपने
इंतज़ार करते हैं
दिन के उदास उजाले का।

सुनीता डागा की कविता 'कितना बतियाती रहती हैं स्त्रियाँ'

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