एक मोहरे का सफ़र

जब वो कम-उम्र ही था उसने ये जान लिया था कि अगर जीना है बड़ी चालाकी से जीना होगा आँख की आख़िरी हद तक है बिसात-ए-हस्ती और वो...

ग्लास लैंडस्केप

अभी सर्दी पोरों की पहचान के मौसम में है इससे पहले कि बर्फ़ मेरे दरवाज़े के आगे दीवार बन जाए तुम क़हवे की प्याली से उठती...

घर

अब मैं घर में पाँव नहीं रखूँगा कभी घर की इक-इक चीज़ से मुझको नफ़रत है घर वाले सब के सब मेरे दुश्मन हैं जेल से मिलती-जुलती...

रिहाई

असीर लोगो उठो और उठकर पहाड़ काटो पहाड़ मुर्दा रिवायतों के पहाड़ अंधी अक़ीदतों के पहाड़ ज़ालिम अदावतों के हमारे जिस्मों के क़ैदख़ानों में सैकड़ों बेक़रार जिस्म और उदास रूहें सिसक...

‘शहर में गाँव’ से नज़्में

यहाँ प्रस्तुत सभी नज़्में निदा फ़ाज़ली के सम्पूर्ण काव्य-संकलन 'शहर में गाँव' से ली गई हैं। यह संकलन मध्य-प्रदेश उर्दू अकादमी, भोपाल के योगदान...

रात सुनसान है

मेज़ चुप-चाप, घड़ी बंद, किताबें ख़ामोश अपने कमरे की उदासी पे तरस आता है मेरा कमरा जो मेरे दिल की हर इक धड़कन को साल-हा-साल से चुपचाप गिने...

बेकराँ रात के सन्नाटे में

तेरे बिस्तर पे मेरी जान कभी बेकराँ रात के सन्नाटे में जज़्बा-ए-शौक़ से हो जाते हैं आज़ा मदहोश और लज़्ज़त की गिराँ-बारी से ज़ेहन बन जाता है दलदल...

बंटू / दो हज़ार पचानवे

उसने शायद खाना नहीं खाया था। रोज़ तो सो जाता था दुबक के फैल के रेल प्लेटफ़ॉर्म पे बेंच के नीचे। क्यों सता रहा है आज उसे बारिश का शोर गीली चड्ढी और...

नींद क्यों रात-भर नहीं आती

रात को सोना कितना मुश्किल काम है दिन में जागने जैसा भी मुश्किल नहीं पर, लेकिन तक़रीबन उतना ही न कोई पत्थर तोड़ा दिन-भर न ईंट के भट्ठे में...

चाबियाँ लैपटॉपों की

जैसे पागलों के सींग नहीं होते ऐसे ही आज़ादों के पंख नहीं होते पर देखा जाए (ग़ौर से) तो होते हैं रंग स्वादों के पेट भ्रष्टों के जूते रईसों के चीथड़े मुफ़लिसों...

इंट्रोस्पेक्शन

आसमाँ का पट कहाँ है पट कहाँ है चाँद का पट में छुप के बादलों के एक सूरज ताकता झाँके बुलबुल पेड़ से छिप कोपलों की आड़ ले और मैं झाँकूँ दूसरों में बस के...

क्रांति: दो हज़ार पचानवे

हा हा हा हा हा हा यह भी कैसा साल है मैं ज़िंदा तो हूँ नहीं पर पढ़ रहा है मुझको कोई सोच रहा है कैसे मैंने सोचा है तब...
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