दिन के खाते में
धूप सिक्के की तरह जमा है

खन-खन बजती दोपहर
बताती है कि
गुल्लक में चमक लबालब है

ख़र्च करने को
बाक़ी है अभी
न जाने कितनी साँसें

न जाने कितनी रातें
इस आस में गुज़रीं
कि कल उड़ जाऊँगा
किसी पंख वाले पक्षी की तरह

न जाने कितने तारे देखकर
भूला हूँ तमाम दुस्वप्नों को
और बचा हुआ हूँ
गिलास की अन्तिम बूँद की तरह

सिक्के होते अगर तो
एक समय के बाद
चलन से बाहर हो जाते

मैं धूप जमा कर रहा हूँ।

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शंकरानंद
शंकरानंद जन्म 8 अक्टूबर 1983 नया ज्ञानोदय,वागर्थ,हंस,परिकथा,पक्षधर,कथादेश,आलोचना,वाक,समकालीन भारतीय साहित्य,इन्द्रप्रस्थ भारती,साक्षात्कार, नया पथ,उद्भावना,वसुधा,कथन,कादंबिनी, जनसत्ता,अहा जिंदगी, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर,हरिभूमि,प्रभात खबर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। कुछ में कहानियां भी। अब तक तीन कविता संग्रह'दूसरे दिन के लिए','पदचाप के साथ' और 'इनकार की भाषा' प्रकाशित। कविता के लिए विद्यापति पुरस्कार और राजस्थान पत्रिका का सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार। कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी। हिन्दवी,पोषम पा, कविता कोश, हिन्दी समय, समालोचन, समकालीन जनमत पर भी कविताएं। संप्रति-लेखन के साथ अध्यापन। संपर्क[email protected]