‘Aawaazein Mara Nahi Karti’, a poem by Suraj Taransh

तुम जला डालो
घास-फूस से बने हमारे घर को
एक तिनका बच ही जायेगा
जो बिंध जाएगा
तुम्हारी आँखों में…
सुलग उठेगी एक चिंगारी
हमारे जलते हुए घर से
जो जला डालेगी
तुम्हारे मकाँ को
सत्ता लोलुप तुम्हारी आकांक्षाओं को
पिघल उठेगी तुम्हारी सोने की लंका
ख़ाक हो जाएगा तुम्हारा अहं
बख़्शेगी नहीं तब तुम्हें
मज़लूमों की आह से उपजी अग्नि।

भले ही कुचल डालो
पद के नशे में चूर अपने क्रूर जूतों से
हाड़-माँस से बने इस शरीर को
दफ़्न कर दो चाहे धरती की कोख में
पर एक बात याद रखना
धरती जननी है
हम उग आएँगे फिर से
तुम्हारे बहाए रक्त की धार से सिंचित होकर
हम फिर से लड़ेंगे
अपने अधूरे सपनों की ख़ातिर
तुम्हारी बर्बरता से मारे गए अपनों की ख़ातिर।

तुम कब तक सत्ता पर रहोगे आसीन?
परिवर्तन शाश्वत है
मिट गए सभी क्रूरतम चेहरें
मुसोलनी, गद्दाफ़ी, हिटलर और स्टालिन
दोज़ख़ ही नसीब हुआ सबको
यह भी याद रखना तुम
तुम दबा तो सकते हो हमारी आवाज़
अपने चापलूस नुमाइंदों के बल पर
पर मार नहीं सकते उन्हें
आवाज़ें कभी मरा नहीं करती
सपनें कभी मरा नहीं करते
आवाज़ें तोड़कर निकल आएँगी
हर एक क़ैद को तुम्हारी
गूँज उठेंगी कहकशां में
फाड़ डालेंगी तुम्हारे कान के पर्दें
सुन्न कर देंगी तुम्हारा दिमाग़
और मशाल बन जाएँगी
हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए।
देखना यह होकर रहेगा एक दिन
जब मिट जाओगे तुम
और ज़िंदा रहेंगे हमारे सपने
ज़िंदा रहेंगी हमारी आवाज़ें।

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