अजनबी नहीं था वो

गुनगुनाती शाम के धुँधलके में
अकेला उगता है पहाड़ों पर चाँद

तुम्हारी आँख से चुराए
काले काजल की चादर में
रोशनी लिपटकर रात हो जाती है

दिन-भर चुपचाप खड़े शाल वृक्ष
तब चुपके से आलिंगन करते हैं
जैसे ख़ाली घर की चौखटें
सन्नाटा पाकर क़रीब आती हैं
लिपटकर रहती हैं सारी रात

ऐसे अजीब अकेले माहौल में
आधी रात को दिन विदा होता है
तब दूसरा दिन शुरू होता है
जब मैं तुमसे कहता हूँ
कहीं जाना नहीं… यहीं रहना

जब अँधेरा हो तब
थके मुसाफिर-सा ठण्डी रेत पर
जब ढल जाऊँगा
यहीं कहीं आस-पास
जब नींद आ जाए मुझे

तो कह देना कि
वो जो सो गया
तुम्हारा नाम लेकर
वो …अजनबी नहीं था!

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