कभी कुछ अनायास नहीं होता
न बीज धरती में स्थित होता है
न पंछी एक डाल से दूसरी डाल
उड़ान भरते हैं
न किसी लड़की के गाल
प्यार, अपमान, तिरस्कार या ग़ुस्से से
लाल भभूका हो तमतमाते हैं

कभी हरदम मनचाहा नहीं होता
न साँस तयशुदा तरीके से चलती है
न शिराओं में उत्तेजना का रक्त बहता है
न केवल चाह लेने भर से
देह में सिहरन उठती है
न कोई सुगबुगाहट आकार ग्रहण करती है

कभी कुछ सही समय पर याद नहीं आता
होठों पर मुस्कान पहले आ जाती है
वजह अनुमान की ओट में रह जाती है
उन्माद दिल में धड़कता है
मुस्कराहट की गहरी परत के पीछे अतीत
अपनी भनक तक नहीं लगने देता

सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता
समय कदमताल नहीं करता
बीतने के बावजूद ढेर सा वर्तमान
बचा रह जाता है वक़्त की परिधि के बाहर
कामनाओं के लिपे-पुते चेहरो पर
उम्र की शिनाख़्त अनचाहे ही सही
बार-बार हस्ताक्षर बनकर उभरती है

अनायास कितना कुछ बीत जाता है
आने-जाने की पदचाप
निश्ब्द्ता में गहरे उतर जाती है…

निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . तीन व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में,हैंगर में टंगा एंगर और बतकही का लोकतंत्र प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]