सिलीगुड़ी
4 फ़रवरी, 70

आदरणीय दादा
सादर प्रणाम

कल रात फिर वही स्वप्न देखा। मैं और सुरभित समुद्र किनारे क़दमों के निशान छोड़ते बढ़े जा रहे हैं। अपर्णा और अर्णव रेत के घरौंदे बना रहे हैं, हठात मैं गिर पड़ती हूँ। सुरभित हाथ बढ़ाते हैं, लेकिन मैं हाथ थाम पाऊँ, इससे पहले ही कोई उन्हें पुकारता है। शायद अपर्णा… अपना घरौंदा दिखाना चाहती है वह! सुरभित ठिठकते हैं और उसकी तरफ़ बढ़ जाते हैं। एक बड़ी लहर मुझे अपने संग बीच समुद्र में खींच ले जाती है। भँवर में डूबते-उतराते… प्रतीक्षा है तो इसकी कि शायद, हाँ शायद एक बार फिर सुरभित मेरी ओर हाथ बढ़ाएँगे। खारा पानी मेरे मुँह के अंदर भरता जा रहा है और सालों से यत्न से रोका यह पानी बाँध तोड़ बह निकलने को आतुर हो चला है! मैं सोच रही हूँ किस पानी में खारापन ज़्यादा है… और नींद टूट जाती है।

आपकी,
पाखी

* * *

मेदिनीपुर
9 फ़रवरी, 70

प्रिय पाखी,
शुभ आशीर्वाद!

जब से तुम्हारा पत्र मिला, तुम्हारे विषय में चिंतित हूँ। सालों से इतना खारा पानी क्यों सहेजे हो पाखी? बह जाने दो। बह जाने दो सारे पुराने स्वप्न… सारी अभिलाषाएँ… सारे उलाहनें! भावनाओं की गर्द हटाकर देखो, पाखी। तुम खिड़कियों पर भारी परदे डालकर सूर्योदय रोकने का प्रयास क्यों कर रही हो? क्यों तुम सुरभित को अपने जीवन का केंद्र बनाए हुए हो? क्यों तुम्हें सदैव उसके हाथ बढ़ाने की प्रतीक्षा रहती है। काश! मैं तुम्हारे पास आ पाता। गार्गी की अवस्था तो तुम जानती ही हो। स्वयं को विवश पाता हूँ। एक बार खड़े होने की चेष्टा तो करो, पाखी! नए सिरे से जीवन जी कर तो देखो। माँ दुर्गा सदैव तुम्हारा कल्याण करें!

तुम्हारा दादा,
शुभेन्दु

* * *

सिलीगुड़ी
13 फ़रवरी, 70

आदरणीय दादा,
चरण स्पर्श

मैं भी कितनी स्वार्थी हूँ न? अपने दुःख में इतना डूब जाती हूँ कि बौदी के स्वास्थ्य की भी सुध नहीं रहती। पहले ही आप इतने कष्ट में हैं तब भी मैं आपको निरंतर और दुःखी करती हूँ। एक ही शहर में होते तो अवश्य ही बौदी की सेवा का अवसर पाती। अपर्णा और अर्णव को छोड़कर आ भी तो नहीं सकती। मेरे अतिरिक्त उन्हें सम्भालने वाला भी कोई नहीं।

दादा, आप सदैव मुझे ख़ुद के लिए जीने को कहते हैं किन्तु सुरभित से अलग मेरे पास कुछ नहीं बचता। कल देखा कि मैं और सुरभित एक घने जंगल से निकल रहे हैं। हर तरफ़ अंधकार है। सुरभित मेरा हाथ पकड़े हैं। मैं उनके कंधे पर सिर टिकाये चली जा रही हूँ। कोई गीत-सा हवाओं में है। शायद सुरभित कुछ गुनगुना रहे हैं। मैं भावविभोर हुई नींद के आग़ोश में समाती जा रही हूँ। अचानक आँखें खुलती हैं तो देखती हूँ कि जो साथ है वह सुरभित तो नहीं… कोई नितांत अपरिचित है… चेहरा नहीं देख पाती… लेकिन सुरभित तो बिलकुल नहीं… मैं घबराकर भागती हूँ। डरती हूँ कि कोई मेरे पीछे आ तो नहीं रहा। चारों ओर सुरभित को खोजती हूँ। नाम लेकर पुकारती हूँ, पर कोई उत्तर नहीं पाती। फिर आगे का स्वप्न कुछ याद नहीं, बस रात भर यूँ ही सुरभित को खोजती रही। सुबह जागी तो सिर भारी था। रविवार का अवकाश था सो बच्चे देर तक सोये थे। अपर्णा सदा की भाँति रज़ाई के बाहर। मैं भी उसे बाँहों में भर पुनः सो गयी। ऐसी निश्चिन्त नींद जैसे महीनों बाद सोयी मैं! सच ही बच्चों में भगवान बसते हैं। बौदी के स्वास्थ्य के लिए भी प्रभु से सदा प्रार्थना करती हूँ। उन्हें मेरा प्रणाम कहिएगा।

आपकी पाखी

* * *

मेदिनीपुर
18 फ़रवरी, 70

प्रिय पाखी,
प्रभु सदैव तुम पर अपनी अनुकम्पा बनाए रखें।

कुछ पल के लिए ही सही पर तुम निश्चिन्त सोयीं, यह जानकर आनन्द मिला। गार्गी को तुम्हारा प्रणाम कहा पर कह नहीं सकता कि उसने सुना कि नहीं। दिन-ब-दिन उसका स्वास्थ्य गिर रहा है। बीते कुछ दिनों से कोमा में है। कभी-कभी लगता है कि मेरी आहट पर आँखें खोलती है, पर डॉक्टर का कहना है कि यह मेरा वहम है। गार्गी और मेरे बीच पचास वर्षों में कोई नहीं आया पर अब ये तीन-चार सफ़ेद कोट सदैव विद्यमान रहते हैं, पर सच कहूँ तो अब ये फ़रिश्तों-से लगते हैं। प्रभु इनके माध्यम से ही सही बस मेरी गार्गी को मेरे सामने बनाए रखें। वह न बोले मुझसे… वह न देखे मुझे… तनिक चिंता नहीं। शब्दों की दरकार नहीं हमें! हमने तो सदा एक-दूजे के मौन को सुना है।

तुम्हारी प्रार्थनाओं के लिए भी कृतज्ञ हूँ। किसे ज्ञात कब कौन-सी मनोकामना को विधाता सम्मति दे दें और मेरी गार्गी अपने घर वापस जा सके। पाखी, पिछले कुछ महीनों में मैं भी बस दो-चार बार ही घर गया हूँ… वह भी चंद पलों के लिए ही। घर के हर सामान पर गार्गी की छाप है… उसकी सुगंध है। घर के परदे, कालीन, बग़ीचा, रसोई में रखे अचार के मर्तबान, मेज़पोश… सब में। जब होश में थी, तब सदा घर चलने की हठ करती थी। तुम तो जानती ही हो अपनी बौदी को। उसे अपने घर के सिवा कहीं नहीं भाता था। अब उसके बिना मुझे भी घर नहीं भाता। जैसी प्रभु की इच्छा!

आज मैं कुछ ज़्यादा ही भावुक हो गया। तुम उदास न होना। फिर गार्गी भी तो तुम्हें दुःखी नहीं देखना चाहती। सुध में होती है तो सदा तुम्हारे पत्रों की प्रतीक्षा करती है। तुमसे और सुरभित से मिलने की कामना करती है। तुम्हें, बच्चों और सुरभित को गार्गी और मेरा ढेर सारा स्नेह और शुभ आशीर्वाद।

तुम्हारा
शुभेन्दु दादा

* * *

सिलीगुड़ी
1 मार्च, 70

आदरणीय दादा,
सादर प्रणाम!

पत्र लिखने में हुई देरी के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। आप दोनों के मध्य जो प्रेम है, वह इतना अलौकिक… इतना पावन है कि भावविभोर कर देता है। आपका पत्र पढ़ने के बाद बस उसी आनंद में डूबी रही। बाल्य-स्मृतियाँ मानस पर छायी रहीं। विधाता ने कब मुझसे माँ की गोद छीन, मुझे बौदी के सुपुर्द कर दिया, कुछ याद नहीं… किन्तु बौदी के आँचल में मैंने सदैव माँ की ख़ुशबू पायी है। दादा, कभी-कभी लगता है कि मैं आप लोगों की अपराधिन हूँ। बचपन में जब ठाकु माँ, दीदी माँ या काकी बौदी को गोद भरने का आशीर्वाद देतीं तो मैं प्रार्थना करती कि बौदी और मेरे बीच कोई न आए। आज अपनी मूर्खता पर पछताती हूँ।

कल सुरभित भी बौदी को याद कर रहे थे। प्रोजेक्ट पूरा होते ही आप लोगों से मिलने आएँगे। इस प्रोजेक्ट ने कितनी दूरियाँ ला दी हैं दादा। सुरभित इस प्रोजेक्ट के लिए छटपटाते हैं और मैं सुरभित के लिए। पिछले छह महीने में शायद ही पन्द्रह दिन घर रुके हों। मैं नहीं समझ पा रही कि हम पा अधिक रहे हैं कि खो अधिक रहे हैं। बस एक बेचैनी है भीतर… जिसे देखने वाला कोई नहीं। दादा, आप कहते हैं न कि सुरभित को अपने जीवन का केंद्र न बनाऊँ पर जब मैं उनसे अलग अपनी धुरी तलाशती हूँ तब वह कुछ ऐसा कर देते हैं कि उन्हें पाने की लालसा और बढ़ जाती है… और जब उन्हें पाना चाहती हूँ तो न उनके मन तक पहुँच पाती हूँ, न ही रूह तक। यूँ अधर में लटके जीवन की पीड़ा बस मैं ही जानती हूँ, दादा। माँ काली ने कुछ तो नियत किया होगा मेरे लिए भी। आज अर्णव के स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम है। वहीं जाती हूँ। बौदी और आपके चरणों में प्रणाम निवेदित करती हूँ।

आपकी पाखी

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मेदिनीपुर
5 मार्च, 70

प्रिय पाखी,

माँ काली सदैव तुम्हारा कल्याण करें।

तुम्हारे पत्रों से तुम्हें अभी भी एक मासूम बच्चे-सा पाता हूँ जो सूखी रेत मुठ्ठी से फिसल जाने पर रोता है और हथेली पर जगमगाते बचे रेत के कणों को अपने वस्त्रों से पोंछ-साफ़ कर लेता है, पर तुम्हें क़ुसूरवार भी नहीं ठहरा सकता। यह मानव मन है ही बड़ा मायावी! जो हाथ नहीं आता उसे पाना चाहता है, जो पास है उसकी उपेक्षा करता है। सुरभित के मन तक… रूह तक पहुँचने के लिए तुम्हें किसी जद्दोजहद की ज़रूरत नहीं, पाखी। तुम पहले ही वहाँ आसीन हो। केवल परिस्थितियों की गर्द है… जो तुम ख़ुद को नहीं देख पाती। हर व्यक्ति अपनी-अपनी अपेक्षाओं के बियाबान में क़ैद है। कुछ तुम उसकी अपेक्षाओं को अपना लो… कुछ वह तुम्हारी। देखना, दोनों साथ खड़े हो जाओगे। अपने दादा पर विश्वास करो। समय आने पर कोहरा छँटेगा और खिली धूप में सब रोशन हो जाएगा।

यह जानकर आहत हूँ कि तुम स्वयं को मेरे और गार्गी के लिए दोषी ठहराती हो। तुम तो हमारे जीवन के मरुस्थल में बहती शीतल नदी हो। अगर तुम्हारी मासूम प्रार्थना ने गार्गी की गोद सूनी रखी है तो तुम्हारी निरंतर प्रभु से कामना गार्गी का स्वास्थ्य भी अवश्य लौटाएगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

शुभ आशीर्वाद सहित
तुम्हारा दादा

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मेदिनीपुर
8 मार्च, 70

प्रिय पाखी,

आज हृदय अत्यंत व्यथित है। पिछले कई दिनों से एक ही शब्द कानों में गूँज रहा है। आए दिन डॉक्टर नए उपकरणों के साथ गार्गी को उबारने का प्रयत्न कर रहे हैं। हर कोई आते-जाते एक दूसरे से कहता है, “ब्रेन डेड”! तुम ही बताओ पाखी, गार्गी ने जीवन जीने के लिए कब दिमाग़ का इस्तेमाल किया? वह तो सदैव दिल से जीती रही। फिर अब ये ब्रेन इतना आवश्यक क्योंकर हो गया? गार्गी को बंधन नहीं भाता था। कभी किसी रिश्ते पर भी उसने अपना कोई हक़ नहीं जताया तथापि उससे मिलते ही प्रत्येक स्वयं ही उसके सरल प्रेम में बंध जाता। गार्गी की इच्छानुसार आज उसे इन उपकरणों से मुक्त कर घर ले जा रहा हूँ। एक नयी यात्रा की ओर प्रस्थान के लिए…!

इस समय तुम लोग यहाँ होते तो शायद यह कष्ट कुछ कम हो जाता। पर मैं स्वार्थी भी तो नहीं हो सकता न! जानता हूँ तुम इतनी कोमल हो कि यह कष्ट सह नहीं सकतीं। सुरभित भी अभी अपनी कठिनाइयों में घिरा है। गार्गी की इच्छा थी मरणोपरांत भी जीवित रहने की। अंगदान के लिए सदैव अपने विद्यार्थियों को भी प्रेरित करती रही। जानता हूँ यह पत्र मैं तुम्हें भेज नहीं सकता पर मेरी वेदना तुम तक पहुँचने का मार्ग खोज ही लेगी।

सच कहूँ तो मैं गार्गी से भी अधिक दुःखी तुम्हारे लिए रहता हूँ। गार्गी ने अपना भरपूर जीवन जी लिया है। अंत समय भी मैं उसके साथ हूँ और मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह अवश्य ही मेरे इस सामीप्य को महसूस करती होगी। तुम न जाने क्यों साथ होते हुए भी सुरभित को ख़ुद से इतना दूर पाती हो? यक़ीन नहीं होता कि हर पल मुस्कराने वाली मेरी नन्ही गुड़िया के मन में कैसे अवसाद ने इतनी गहरी पैठ कर ली। तुम अभी रेशम की नाज़ुक डोर पर सधी खड़ी हो। कोई भी आघात तुम्हारे मन को गहरी ठेस पहुँचा सकता है। सारे कार्य गार्गी की इच्छानुसार सम्पन्न होने के पश्चात तुमसे भेंट करूँगा। ऐसा कौन-सा अवसाद का समंदर है जिसे सुखाने की सामर्थ्य तुम्हारे दादा के स्नेह में नहीं?

तुम्हारा दादा,
शुभेन्दु

* * *

सिलीगुड़ी
8 मार्च, 70

प्रिय दादा,

क्या कहूँ? कुछ समझ नहीं आ रहा है। एक अनचीन्ही बेचैनी है… अनिष्ट आशंका सी! कल रात ऐसा प्रतीत हुआ जैसे आप मुझे पुकार रहे हैं। बौदी गोद में लिए मुझे दुलार रही हैं। फिर अंधकार छा गया… मन घबराने लगा… आँखें खुल गईं। सुरभित भी घर पर नहीं हैं, सदा की भाँति बाहर ही हैं। ऐसा लगता है कि मैं यहाँ हूँ और मन आपके साथ गाँव में! हर पल मुझे गाँव आने को पुकारता हुआ-सा लगता है। जल्द ही आप दोनों से मिलने की इच्छा प्रबल होती जाती है। सुरभित के वापस आते ही हम मेदिनीपुर आएँगे… और इस बार आप हमें आने से रोकेंगे नहीं। प्रभु हमारे परिवार पर अपनी अनुकम्पा बनाए रखें!

आपकी स्नेहाकांक्षी,
पाखी

* * *

सिलीगुड़ी
12 मार्च, 70

दादा, सब कुछ मानो छूटता-सा जाता है। न क़लम उठाते बनता है, न काग़ज़। सो बिना इन साधनों के ही यह ‘पत्र’ आपको समर्पित है। जाने क्यों विश्वास है कि आपके स्नेह-डोर में बंधे यह शब्द आप तक पहुँच ही जाएँगे। सुरभित को परसों लौटना था, पर वह नहीं आए। कोई ख़बर भी नहीं। अपर्णा और अर्णव भी बार-बार उनके बारे में पूछते रहे। आज सुबह सुरभित आए। मायूस जान पड़ते हैं। सम्भवतः कुछ नए अवरोध उत्पन्न हुए हैं। मैं जानना चाहती हूँ पर वह विषय बदलते हुए सबको घुमाने बाहर ले जाना चाहते हैं। मैं भी उनके साथ जाना चाहती हूँ पर उठ नहीं पा रही। वह कह रहे हैं— ‘तुम आराम कर लो। बच्चे ज़िद कर रहे हैं, मैं उन्हें घुमा लाता हूँ।’ मैं चाहती हूँ हाथ पकड़कर उन्हें रोक लूँ। शायद हाथ पकड़ भी लेती हूँ। वह कहते हैं— ‘हम जल्दी आ जाएँगे।’ सुरभित और बच्चे चले गए हैं। घर में व्याप्त मौन मानो रह-रहकर चीत्कार रहा है। दिन ढल रहा है… अंधकार घिर रहा है… और इस अंधकार की एक गहन चादर मुझे जकड़ती जा रही है। दम घुट रहा है। जैसे कोई मुझे अँधेरी गुफा के भीतर धकेल रहा है।

मैं नहीं जाना चाहती, दादा। मुझे रोक लीजिए। मुझे थाम लीजिए।

कौन? क्या आप ही हैं दादा?

साथ कौन है?

इन साँसों की ऊष्मा जानी-पहचानी है… सुरभित… सुरभित?

यह कैसा शोर है? एम्बुलेंस? मैं नहीं जाना चाहती एम्बुलेंस में… मैं तो बस तुम्हारी बाँहों में ही रहना चाहती हूँ सुरभित… मत जाओ सुरभित… रुक जाओ…! मेरा यह आत्मालाप कोई सुन रहा है क्या?

* * *

मानसिक रोग वार्ड,
सिलीगुड़ी
14 मार्च, 70

ऐसा लग रहा है जैसे कई दिनों से सोयी ही हूँ। नींद भी तो बरसों से अधूरी थी न! कुछ अस्फुट से स्वर उभर रहे हैं। मेरे हाथों पर यह स्पर्श कैसा? माथे पर किसके अश्रुमोती गिरे? कौन कह रहा है— “पाखी, मुझे एक बार पुकारा तो होता। मैं व्यस्त था… विवश… था किंतु तुमसे विरक्त तो नहीं! एक अनजान राह पर बस चला जा रहा था। मुझे ख़ुद नहीं पता था कि मंज़िल कहाँ है? कोई मंज़िल है भी कि नहीं। बस सब दौड़ रहे थे। मैं भी दौड़ रहा था। हारने से डरता जो था। तुमने बढ़कर मुझे रोक लिया होता, पाखी!”

“सुरभित! रोक लूँगी सुरभित! अब रोक लूँगी। तुमने मुझको रोक लिया न! मैं भी तुम्हें रोक लूँगी। बस बहुत हुआ दौड़ना। हमारी मंज़िल तो हमारा छोटा-सा घरोंदा है।”

मैं सही कह रही हूँ न दादा? मुझे सुन रहे हैं न आप? आपका हाथ मेरे सिर पर है तब कैसी चिंता। सोयी रह सकती हूँ। शुभरात्रि।

* * *

सिलीगुड़ी
22 मार्च, 70

प्रिय दादा,
चरण स्पर्श!

जानती हूँ इस पत्र को स्टेशन पर ही पढ़ लेने का लोभ आप संवरण नहीं कर पाएँगे। चाहती थी कि आपके चरणों में गिरकर आपसे क्षमा माँगूँ। पर अपनी हर अभिव्यक्ति के लिए सदा से पत्रों पर आश्रित हूँ। आप जानते ही हैं। इस बात की ग्लानि सदा रहेगी कि जिस समय आपको मेरी सबसे ज़्यादा आवश्यकता थी, उस समय मैं स्वयं एक आश्रित बेल-सी वटवृक्ष तलाश रही थी। अंत समय बौदी की चरणधूलि भी न ले पायी। नियति तो देखिए दादा! सुरभित को पाया तो बौदी को खो दिया। प्रभु भी कितना नाप-तौल करते हैं।

बौदी की तो कोई सेवा नहीं कर पायी। आप यहीं ठहर जाते तो कुछ पुण्य अर्जित कर पाती, पर जानती हूँ कि बौदी के अधूरे कार्य आपको ही पूरे करने हैं। यथासम्भव प्रयास करूँगी स्वयं को इस लायक़ बनाने का कि आपको कभी कोई दर्द अकेले न सहना पड़े दादा। अर्णव और अपर्णा की वार्षिक परीक्षा ख़त्म होते ही हम लोग गाँव आ रहे हैं, ऐसा सुरभित लिखवा रहे हैं। अपना ध्यान रखिएगा दादा।

आपकी चिंता बनी रहेगी। पत्र लिखते रहिएगा।

आपकी बावरी
पाखी

* * *

सिलीगुड़ी
22 मार्च, 70

प्रिय पाखी
शतायु भव

तुमसे न कहकर, पत्र छोड़ रहा हूँ। इसे अपने दादा की थाती समझ सहेजे रहना। कल यूँ भी हो सकता है कि मेरा पता बदल जाए और नए पते पर कोई भी डाक न आती हो। जब भी स्वयं को अकेला पाओ, तब इस पत्र को अपने दादा का आशीर्वाद समझ पढ़ लेना। जीवन अभेद्य है। यूँ समझो एक अंधियारी सुरंग में चलते जाना है। जिस हाथ को थामो, उस पर अटूट विश्वास रखना और स्वयं पर भी। राह अंधियारी भी हो तब भी मुहाने पर उजास की आस चलते रहने का हौंसला देती है और अंततः उसे पार भी करा देती है। विश्वास जीवन का ताल है, इसकी अनुपस्थिति प्रेम को बेताल कर देती है। स्वर मीठा भी हो तो कर्णप्रिय नहीं रहता… मन में नहीं बस पाता।

ज्यों दर्पण में हम स्वयं को देखते हैं, यूँ ही जीवन में भी। ज़रा-सा दर्पण तिरछा करोगी तब साथ खड़े सुरभित को भी देख पाओगी। अपने दर्पण का दायरा विस्तृत करना। सुरभित को भी अहसास है अपनी ग़लतियों का। सपने देखना ग़लत नहीं किन्तु सपनों की व्यावहारिकता का भी भान आवश्यक है। जीवन की गति जितनी धीमी होगी, उसका आनन्द उतना ही अधिक! दोनों एक-दूसरे का सहारा बनना। आगे निकल जाओ तब ठहर जाना… पीछे छूट जाओ तब कुछ क़दम तेज बढ़ा उसके साथ हो लेना। पुकारने से कभी झिझकना मत। दाम्पत्य में प्रेम, जल में घुली शक्कर है… दिखता नहीं पर मिठास विद्यमान होती है। बिना चखे अनुभूति कैसे हो पर?

पाखी, जीवन की सार्थकता किसी और पर निर्भर होने में नहीं, दूसरों का सहारा बनने में है। अपने आस-पास देखना कोई प्रतीक्षित हो, शायद तुम्हारे हाथ के लिए… उसे उठने में मदद करना। औषधियाँ तुम्हें सहयोग अवश्य करेंगी पर उन पर आश्रित मत होना। जब तक इस पते पर हूँ, तुम्हारे पत्रों और तुम लोगों के आगमन के लिए सदा प्रतीक्षारत रहूँगा।

सस्नेह
तुम्हारा दादा
शुभेन्दु

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डॉ. निधि अग्रवाल
डॉ. निधि अग्रवाल पेशे से चिकित्सक हैं। लमही, दोआबा,मुक्तांचल, परिकथा,अभिनव इमरोज आदि साहित्यिक पत्रिकाओं व आकाशवाणी छतरपुर के आकाशवाणी केंद्र के कार्यक्रमों में उनकी कहानियां व कविताएँ , विगत दो वर्षों से निरन्तर प्रकाशित व प्रसारित हो रहीं हैं। प्रथम कहानी संग्रह 'फैंटम लिंब' (प्रकाशाधीन) जल्द ही पाठकों की प्रतिक्रिया हेतु उपलब्ध होगा।