‘Asli Jeet’, a poem by Suraj Ranjan

ईरानी महिला मुक्केबाज सदफ़ ख़ादिम और उसके जैसी संघर्षपथ पर अविराम गति से अग्रसर सभी महिलाओं को समर्पित

तुम जीत सकती हो पूरी दुनिया
यह तो बहुत आसान है तुम्हारे लिए
पर इससे भी ज़्यादा मुश्किल है
तुम्हारे घर और समाज के उन
दकियानूसी और कट्टर ख़्यालातों को हराना
जो अपनी दस उँगलियों पर घुमाता है
तुम्हें कठपुतली की तरह…
जो धर्म के विकृत धागे से बाँधकर
नचाता है ‘अवचेतन मन’ को तुम्हारे…

वह कौन है जो तय करता है?
क्या पहनोगी तुम, क्या खाओगी
क्या करोगी, कहाँ और किसके साथ रहोगी…
मैं कहता हूँ…
उसे इन सब बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता
अगर तुम पूरी करती रहतीं उसकी हर इच्छा…

वह बिलबिला तब उठता है जब
तुम मशाल बन जाती हो
उस अंधकार को मिटाने के लिए
जिसके गहरे घाव तुम्हारे हृदय पर
सदियों से देता आया है वो…
वह तड़प उठता है तब
जब तुम मिसाल बन जाती हो
अपने जैसी लाखों कठपुतलियों के लिए…
आँखों से उसके बरसने लगते हैं तब अंगारे
बौखलाकर कभी वो नोंचता है अपनी दाढ़ी
तो कभी केश… झुँझलाता है… पटकता है सिर…
फिर अंतिम ज़ोर लगाता है
तुम्हारी परवाज़ को रोकने को
पर अब रुकना नहीं है तुम्हें
डर किस बात का?
मुक्के में इतना दम है तुम्हारे
जब पूरी दुनिया को शिकस्त दे सकती हो
तो इनको क्यों नहीं?
मैं तो कहता हूँ…
जब ये आयें तुम्हारे पास
अपने फरमान तुग़लकी लेकर
जड़ डालो एक करारा मुक्का उनके थोबड़े पर
तोड़ डालो वो दाँत जो हँसते थे तुम्हारी बेबसी पर
नोंच डालो वो दाढ़ी
जिनकी आड़ में छिपी है एक कुटिल मुस्कान
उखाड़ लो वह चुटिया जिसका एंटीना
सिर्फ धर्म के वीभत्स रूप से जुड़ता है…
तभी होगा सार्थक तुम्हारा स्वर्ण पदक जीतना…
वही असली जीत होगी तुम्हारी…