‘Avkaash’, a poem by Anupama Mishra

सीधे रास्ते पर घुमावदार क़दमों की चहल-पहल,
और दिमाग़ में तैरते विचारों की रस्साकशी।
मन की अभिलाषा,
पहाड़ों पर लम्बी पेड़ों की क़तारों में
गुम हो जाने की,
परन्तु कर्तव्यपथ की माँग
कँटीले तारों पर चलते जाने की।
मन की आतुरता गीली सूखी पगडण्डियों पर
गिरने सम्भलने की,
जीवन की गाड़ी, कभी इस पटरी कभी उस पटरी।
रुकती ही नहीं भागदौड़,
जो भगाती रहती है
सुबह से शाम,
दिन और रात,
जहाँ भागते-भागते पैरों में
पड़ जाते हैं छाले
और इस तमाम भागदौड़ के दौरान
पैरों के छालों की ओर दृष्टि घुमाने का भी अवकाश
मिल नहीं पाता।
अवकाश जीने का, दोबारा उन दुपहरों को
जब लेटकर आँगन की गोद में,
जूट की खाट पर भी मिल जाया करता था
थकी पीठ को आराम।
अवकाश उन क्षणों का
जब तालाब, नदी, पोखर के किनारे
बैठकर घण्टों भी,
नदी में डूबने-उभरने की लोलुपता बाक़ी-सी ही रह जाती थी।
अवकाश उन अशेष इच्छाओं का
और फिर से महसूस कर पाने की लालसा,
उन बुलबुलों को,
जो बनकर-फूटकर
एक अनोखा जादू का खेल दिखाते थे।
अब भी नहीं होता विघटन उस क्षण का
जब जीवन धारा में बहकर,
हाँ उसी दिशा में जहाँ विपरीत धारा को
दी अनुमति, बहा ले जाने की,
वो मन माँगता रहता है बस एक अवकाश
यथार्थ से छिपकर,
बीते दिनों में कहीं भटक जाने का।