अवसाद में डूबी औरतें

‘Avsaad Mein Doobi Auratein’, a poem by Pallavi Vinod

ये अवसाद में डूबी औरतें
कभी निकलना नहीं चाहतीं अपनी उदासी से
इनकी उदासियों को चिरंजीवी
होने का वरदान मिला है
अपने आस-पास बिखरे
हर दर्द को स्वेच्छा से वरण कर
जीवन पर्यन्त साथ निभाती हैं।

प्रसव की असह्य पीड़ा के बाद
ख़ुशी को जन्म देती हैं
बच्चों की तरह पोषित करती हैं
फिर डूब जाती हैं अपने संसार में
तुम कह सकते हो इन्हें दुःखी होने का बहाना चाहिए
वास्तव में यही सच है!
कामवाली की पीठ के नीले निशान
मालिन के गुज़र जाने पर बुज़ुर्ग माली की उदास आँखें
माँ की बीमारी
ससुर की खोती यादें
वो सबकुछ जो इनके सामने से गुज़रता है
ओढ़ लेती हैं लिहाफ़ की तरह
व्यवहारिकता की ठण्ड इन्हें बर्दाश्त नहीं होती।

और तुम छोड़ देते हो इन्हें इनके हाल पर
कभी पूछा है नींद की गोलियों के सिवा
इन्हें चाहिए कौन सी दवा?

अगली बार जब भी ये तुम्हारी तरफ़ उम्मीद से देखें
इन्हें बाहों में भरकर इनकी भीगी आँखें चूम लेना
कुछ लुढ़की हुई बूँदों को
अपनी अंजुरी में संजो लेना

ये दर्द समेटी औरतें तुम्हें हर अवसाद से खींच लायेंगी।

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