खण्डित प्रेम

‘Khandit Prem’, a poem by Pallavi Vinod

विलय और विलग होने से परे था मेरा प्रेम
नहीं मैं बूँद नहीं थी
न तुम समंदर
मैं हवा भी नहीं थी
जो सिर्फ़ महसूस हो
हम दो स्वतन्त्र व पूर्ण अस्तित्व थे
बहुत ख़ूबसूरत पलों के गवाक्ष
मैं तुम्हारे साथ बहुत दूर तक चलना चाहती थी
अनुगामी नहीं सहगामी की तरह
मुझे हर रंग से प्यार था
मेरे सांवले रंग पर फबे या न फबे
मेरी जिह्वा को स्वाद बदलने की आदत न थी
पर तुम उसे बदलना चाहते थे अपने स्वादानुसार
मुझे फीका रंग पहनाकर तुम मेरा सौंदर्य
द्विगुणित होने जैसी बातें किया करते थे।
धीरे-धीरे तुम पर प्रेमी से ज़्यादा पुरुष हावी हो गया
जिसे मेरे अंदर एक कमबुद्धि स्त्री नज़र आने लगी।
बस वही पल था जिसमें मेरा प्रेम खण्डित हो गया

और तुम चाहते हो मैं उसी खण्डित मूर्ति की पूजा करूँ!

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