बाज़

योगेश मिश्रा की कविता ‘बाज़’ | ‘Baaz’, a poem by Yogesh Mishra

एक बाज़ ने कब्ज़ाया है एक गाँव
जिसे बसाया था चिड़ियों ने
जिसमें रहते थे घोंसले
बिखरते थे तिनके
महकती थी ख़ुशबू
गूँजती थीं कोयलें
धीमी हवाओं में
झूमती थीं फ़सलें

बाज़ ने बदले हैं कुछ नियम
चीलों को दिए हैं नए घर
बिखेर दिए हैं माँस के लोथड़े
गँध से सड़ रही है हर गली
ख़ुशियाँ हैं गुमनाम
चीख़ है शहर की नयी पहचान
हवाओं में तैरते हैं अब सिर्फ़ ख़ंजर
झूमते खेत अब हैं बंजर

बाज़ ये कहता है
हिफ़ाज़त है इसका नाम
सीमाएँ हैं सुरक्षित
पुख़्ता है इंतज़ाम
अब कोई बाहरी
नहीं कर पाएगा परेशान
अधूरी पड़ी इमारत का
तामीरख़ाना रखा गया है नाम

बाज़ को पसंद नहीं हैं आवाज़ें
चीख़ें भी वो बस देखता है
पीठ कर के घोंसलों की तरफ़
आमीन-आमीन कहता है
बाज़ के गुट में हैं कुछ गिद्ध
शहर की आँख नोचना हैं जिनके सपने
बाज़ चिड़ियों को सिखाता है
गिद्ध भी तो हैं अपने

बाज़ ख़त्म कर देगा
शहर के रंगों को
नोच खाएगा
ख़िलाफ़त में उठते अंगों को
जब अपने घर में भी
सिर्फ़ डर होगा, क़हर होगा
आसमान में उड़ेंगें गिद्ध और चील
वो बाज़ के सपनों का शहर होगा।

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