बचपन की वो हसीन यादें, भूले न भुलाई जाती हैं,
वो बारिश की रिमझिम बूदें, और कागज़ की कश्ती ज़ेहन में आती हैं,
पापा के डर और माँ का दुलार, वो प्यारा सा एक लम्हा है,
जिस पर दुनिया की हर दौलत, न्योछावर कर दी जाती है,
स्कूल का बस्ता, तब नाज़ुक कंधो पर भारी लगता था,
लेकिन स्कूल की वो मस्ती, आज भी मन को हल्का कर जाती है,
मोहल्ले में यारों की वो टोली, शाम होते ही नज़र जो आती थी,
आज उन्ही को देखने की ख़ातिर, आंखे ये तरस सी जाती हैं,
कोई लौटा दे वो किस्से, जिसे सुनकर नींद आया करती थी,
नानी-दादी की वो मनोहर कहानियां, आज भी मन को भाती हैं,
छोटे थे जब, तब बड़े होने की इच्छा मन में आती थी,
आज उसी बचपन की यादें, ये आँखे नम कर जाती हैं,
चाहूं भी तो लौट ना पाऊं, बचपन की उस दुनिया में,
उसे तो जितना सोचूं मैं, वो यादें उतनी गहराई दे जाती हैं…

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