हवा से तेज़ घोड़े पर सवार
बड़ी खतरनाक मुहिम पर निकला था
बचपन की कहानियों का राजकुमार।

चलने के पहले ही गुरु ने समझाया था
पहले गये हुए लोगों के पथरीले बुतों ने
रास्ते में मिल कर चेताया था
लौट कर न देखना
सीधे चले जाना, याद रहे
मुड़ कर यदि देखा तो
पत्थर हो जाओगे।

रात के अंधेरे में घुल गयी
भीनी-भीनी सुगंध
जाने किन-किन फूलों की
फिर कोई पायल झंकार उठी
खिल-खिल-खिल हंसती
किलकती पुकार उठी। रुका नहीं।
जाने कैसा वह मन था जो
ऐसी पुकार पर टिका नहीं
झुका नहीं, लौट कर देखा नहीं।
बढ़ता गया। अभी उसे याद था
आगे जो गये थे, लौटे नहीं थे।
यही दृश्य देखा था लौट कर
पत्थर हो गये थे।

अंधियारा और भी गहरा हुआ
हर कहीं फैल गया सन्नाटा ठहरा हुआ
फिर वह आवाज़ उठी और दिल
दहल गया, रोती हुई दीन-सी
घुटती हुई सांस, हिचकी दम तोड़ती
चीख डूबती-सी, कि आओ
बचा लो मुझे, रुका नहीं।
जाने कैसा वह मन था
जो ऐसी पुकार पर टिका नहीं
झुका नहीं। बढ़ता गया।
यही एक ढंग है बढ़े चले जाने का –
लौट कर न देखना।
अभी उसे याद था
आगे जो गये थे
अब तक भी लौट नहीं पाये थे
यही दृश्य देखा था लौट कर
पत्थर हो गये थे।

बहुत समझदार था छोटा राजकुमार
खतरनाक मुहिम पर निकल कर
चलने के पहले ही पत्थर था
बढ़ता जा सकता था
संभव था उसके लिये
लौट कर न देखना।

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अर्चना वर्मा
जन्म : 6 अप्रैल 1946, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) भाषा : हिंदी विधाएँ : कविता, कहानी, आलोचना मुख्य कृतियाँ कविता संग्रह : कुछ दूर तक, लौटा है विजेता कहानी संग्रह : स्थगित, राजपाट तथा अन्य कहानियाँ आलोचना : निराला के सृजन सीमांत : विहग और मीन, अस्मिता विमर्श का स्त्री-स्वर संपादन : ‘हंस’ में 1986 से लेकर 2008 तक संपादन सहयोग, ‘कथादेश’ के साथ संपादन सहयोग 2008 से, औरत : उत्तरकथा, अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य, देहरि भई बिदेस संपर्क जे. 901, हाई बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डन, अहिंसा खंड-2, इंदिरापुरम, गाजियाबाद

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