कपास के फूल विलुप्त
हो जायेंगे
किसी दिन
ढूँढने लगेंगे सब
किताबी अनुभूतियों में!
रंगहीन तितलियाँ मंडराने लगेंगी
गंधहीन फूलों पर
सतरंगी इन्द्रधनुषी वितान
आधे धूप छाँव की मनुहार
नहीं मानेंगे
नीले आकाश का निमंत्रण
अस्वीकार कर छुप जाऐंगे
सदा के लिए
क्षितिज की परिधि से।
तुमुल कोलाहल में विलीन हो जाएगा
हवाओं का मधुर संगीत
कविताओं का साँस लेना
दूभर होगा शायद…!
कवि पत्थरों को तराश कर मूर्ति की कल्पनाऐं लिखेगा…
मरु के अंतस में धार के स्वपन…
और खण्डहर के अवशेषों में ढूँढेगा प्रेम गीत…
कविताओं को जीना होगा
किसी भी भाँति
जीवन के लिए…

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प्रीति कर्ण
कविताएँ नहीं लिखती कलात्मकता से जीवन में रचे बसे रंग उकेर लेती हूं भाव तूलिका से। कुछ प्रकृति के मोहपाश की अभिव्यंजनाएं।

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